एक “ऊं”  जिसमें जिव्हा मुंह नही मारती, उसका प्रारब्ध है फिर अनन्त आरती।

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(Om Valley:Om Valley founded by scientists near bhopal ‘ऊँ’ के …

‘ऊँ’ के बीच बना है मध्य भारत का सोमनाथ मंदिर, वैज्ञानिकों को मिले।)

ये जो पक्षियों का कलरव है इसमें ए चिड़िया, 

तेरा चहचहाना समाहित है खोया नही है।

‘ऊं’ एक है पर पूरी प्रक्रिया है समझ ले,

महज़ उच्चारण नहीं है इसका प्रारब्ध है अन्त नहीं है।

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श्मशान का कर्मचारी:कर्म-काण्डी

          श्मशान का कर्मचारी

(दुआ करता है रोज़ी रोटी चलती रहे और काम न आए)

कहां गया होगा देर रात लौटा नहीं अभी तक,
सूरज, ढलने के बाद श्मशान तो नहीं मयखाने गया होगा।

वक्त पर काम आ गया होगा हस्पताल गया होगा शायद,
जिसकी खबर आ गई होगी उसके घरवालों से मिलने गया होगा।

वो कहता था ये कचरा कमाल का पार्थिव है
रोज़ सुबह हाजिरी लगाता था आज अलविदा कह गया होगा।


बाट तब तक पलटने नहीं देंगे,           पढ़नी पड़ेगी सफा-दर-सफा कहानी।

सफों में इन्तज़ार टहलता है

आदत है उसे बाट जोहने की।

आखिरी पन्नो तक शायद मिल जाए,

देर पक्का है शायद अन्धेर न होने की।


तू सम्भाल उसे इन्तज़ार के सफों में, इस तरह बाट  जोही नहीं होती।

मरना कई तरीकों से होता है,
एक किताब हूं मुझे पढ़ाकर कभी।
आज खुद मैने अपने से एकान्त में बात की, 
क्या किसीने खुदको खुदासे लड़ते देखा है कभी।

आग पर रक्खी पतीली में
कड़छी घुमा न कभी।
प्यार को ताजा रख,
खून उबले तो लड़ा कर कभी।

तुझे तेरी नाराज़गी के सबब पता नहीं है,
हमपर बरस के देख न खुलकर कभी।
मौसम ऐसे ही बदलता रहता है यहां,
रलमिल कर बैठता है, तो उठकर ढलता है कभी।

गरीबी काम करती है गरीब का सस्ते में,
गरीब का बच्चा खाने में मिट्टी मांगता है कभी।
अमीरी के भी सन्तुलन बिगड़े हुए हैं,
भूख तब लगती है जब दवाई लेता है कभी।

क मरना कई तरीकों से होता है,
एक किताब हूं मुझे पढ़ाकर कभी।
आज खुद मैने अपने से एकान्त में बात की, 
क्या किसीने खुदको खुदासे लड़ते देखा है कभी ।

आग पर रक्खी पतीली में
कड़छी घुमा न कभी।
प्यार को ताजा रख,
खून उबले तो लड़ा कर कभी।

तुझे तेरी नाराज़गी के सबब पता नहीं है,
हमपर बरस के देख न खुलकर कभी।
मौसम ऐसे ही बदलता रहता है यहां,
रलमिल कर बैठता है, तो उठकर ढलता है कभी।

गरीबी काम करती है गरीब का सस्ते में,
गरीब का बच्चा खाने में मिट्टी मांगता है कभी।
अमीरी के भी सन्तुलन बिगड़े हुए हैं,
भूख तब लगती है जब दवाई लेता है कभी।

इस पैन के भीतर की स्याही,क्या केवल ‘उजाला’ लिखती है?      सूरज ने सबको बराबर की रौशनी दी है,अन्धेर गर्दी फिर क्यों दिन-दहाड़े दिखती है? 

अच्छा हुआ स्याही बिखेर दी तूने, मुंह काला होने से बच गया कागज़ जो काला कर दिया तूने।

कितने किस्से चुप हो गये, खूबसूरती पर अस्मत लुटने का इल्ज़ाम आता, एक कमसिन को बचा लिया तूने।

उसका तराज़ू उसकी मर्ज़ी….

Balancing acts are all in vain

When your weighs are wrong

उसका तराज़ू है उसी की मर्ज़ी,
खुदा कहीं का…….

दो दिन में खर्च कर दी उसने
                         सारी जमा पूंजी,
पर एक एक मुस्कुराहट का हिसाब दे गया
                         गुलाब कहीं का।

मै तुझसे कुछ मॉगूं और, और तू मुझे 
                           कुछ और दे,
उसका तराज़ू है,   उसी की मर्ज़ी
                          खुदा कहीं का।

एक मुक्कमल सिलसिला है गुजरने का
                     फिर भी कभी कभी,
क्यों बॉधकर रखने नहीं देता इन सॉसों को
                            वक्त कहीं का।

शक्ल से मुक्कमल, आधे-अधूरे आदमी,
                    भुरि-भुरि सी ख्वाहिशें,
ऑखों का नशा, सधे हाथों पकड़ना चाहता है
                         ख्वाब कहीं का।

मुझे खिलना सिखा गयी, आवारा सी शोखियॉ,
                     ऑखों के सामने चोरियॉ।
कनखियों से मुखबरी, प्यारी सी वो गालियॉ,
                            लुच्चा कहीं का।