वो अभिव्यक्त कर गया इशारों में, मुझे शब्द नहीं मिले किताबों में।

वो अभिव्यक्त कर गया इशारों में,
मुझे शब्द नहीं मिले किताबों में।

कितना प्यार करते हो कहकर सोचने लगा,
फिर मौन सिमटकर फैल गया बांहों में।

आज मन हल्का है शायद रोया बहुत है,
पैमानों से खुशी कहां नपती है मयखानों में।

मौहब्बत पर इल्ज़ाम देना नादानी नहीं है
नादानी का जज़्बा होता नहीं खराबों में।

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On Valentine Day

कुछ लोग प्यार के इज़हार में क्रान्ति ला रहे हैं,
टीन<=>वाले
ही खाली ढोल बजा बजा कर
Vale n tine मना रहे हैं।

वैलेंटाइन की शम्मा कभी इन्होने जलाई थी ,
ज़माना महका था इनके इमकान को देखकर ।

अमृता का इमरोज़ सही,
इमरोज़ की अमृता रही सदाबहार।

Ek din ‘hi’ Rose ne kaha:
I M ROZ
मुझमें दो दिन का इमकान* है
खुश्बु सदाबहार उसकी उसमें कुसमसाती रही।
*सामर्थ्य

तुझे देखकर बस गुज़ारा कर लेता हूं, पता है,ज़्यादा खर्चा जल्दी कँगाल करे है।

आँख बन्द करता हूं तो आईना ज़ाहिर होता है मुझपर, मेरे सुकून को ये ख्याल बांटने की आदत नहीं गई।

जीते जी मार देती है समाधि को शैया मेरी, मेरी मन को मौके पर मारने की आदत नहीं गई।

Zindagi

कागज़ का हवाई जहाज़ हवा में,
और कागज़ की कश्ती पानी में।

किसे बहा देता है किसे छोड़ देना है,

किसे तरजीह दूं अपनी इस अधूरी कहानी में।

केटर-पिलर से तितली तक
कितने रंग बदलती है जवानी में।

गर्मियों की छुट्टियाँ या छुट्टियाँ गमों की, चांदनी रात या चांदनी सुलगती रातों की।

सैलानी

(एकांकी – एक नाटक है)

शब्द जब मेरे साथ खेलने लगे
कहानी उदास थी कुछ देर को बहल गयी।
जैसे कोई दिल्ली छोड़कर शिमला गयी
फिर शिमला से उक्ताई, कुछ देर चहल गयी।

उदासियों ने एकान्त ढूंढा
फिर एकान्त को एक और एकांकी* मिल गयी।
वो भी अकेली मैं भी अकेला बावज़ूद विरोधाभास के,
जैसे बिना अन्तरद्वंद के नाट्य-को अकेली शैली मिल गई।

क्या सच में सैलानी घूमने आता है या भूलने,
या भटके हुए को रहजनी में मुक्ती मिल गई।
मरा मरा रटते-२ मुंह से राम राम निकल गई
पोलिथिन खपाने में प्रकृति मिट्टी में मिल गई।

*एकांकी की परिभाषा
एक ही अंक में खत्म होने वाला।
ऐतिहासिक एकांकियों में भारतीय संस्कृति का मेरुदंड-नैतिक मूल्यों में आस्था और विश्वास का दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है।’ उनके सामाजिक एकांकी प्रेम और सेक्स की समस्याओं से संबंधित हैं। ये एकांकी मानसिक अंतर्द्वंद की आधार भूमि पर यथार्थवादी कलेवर में समाज और जीवन की वस्तु-स्थिति तक पहुँचते हैं। पर इन एकांकियों में लेखक की आदर्शवादी सोच इतनी गहरी है कि वे आदर्शवादी झोंक में यथार्थ को मनमाना नाटकीय मोड़ दे बैठते हैं। इसलिए उनके स्त्री पात्र शिक्षा और नए संस्कारों के बावजूद प्रेम और जीवन के संघर्ष में जीवन का मोह त्यागकर प्रेम के लिए उत्सर्ग कर बैठते हैं मानो उत्सर्ग^ या प्राणांत ही सच्चे प्रेम की कसौटी हो। आधुनिक पात्रों पर भी लेखक ने अपनी आदर्शवादी सोच को थोप दिया है।[1]
*one play act .
^उत्सर्ग- त्याग,बलिदान।

I like the quote on novel by Megal Macooey:Full moon

ख्वाब तोड़ लाओ पक गये होंगे,
इश्क के बगीचे से उनकी खुश्बु आ रही है।

कल नींद ने बताया वो आने वाला है।।

अब मैं उठते बैठते उसे सोचने लगा हूं,
वो भी ख्यालों में स्वेटर बुनती जा रही है।

एक फन्दा छूटा गया था कोई उठाने वाला है।।

गर मैं कह़ू ज़िन्दगी एक ख्याल ही तो है,
भीतर संगीत है बाहर गज़ल बुला रही है।

नींद ने बताया झोंका कोई आने वाला है।।

मैं सोचता हूं गर ये जिस्म रूह देखने लगे,
क्यों फूल की हर पत्ती गुलाब हुई जा रही है।

आफताब को क्या पता है कौन ऊर्जाने वाला है।।