ईन्सान की खामोशी का मतलब है कि वो समझ चुका है, अब बस बहस रह गई है खुदा सुन चुका है।

आज का विचारः मैं कभी कभी सोचता हूं कि मेरी अपनी एक ऐसी अदालत हो। जिसकी  ढयोडी में कोई फरियादी जैसे ही कदम रक्खे वो न हिन्दू रहे  न मुस्लमान, न सिख रहे न ईसाई बस एक आदमी हो, इन्सान हो या इन्सान बनने की चाहत रक्खता हो।
अगर एसा हो तो शायद फैसले की ज़रुरत  भी यदा-कदा ही पड़े।

जहां भी बीच में धर्म आ गया,
सियासत कूद पड़ी पहले, खुदा किनारे हो गया।

अगर अल्लाह एक है तो कविता में खुदा लिखूँ,
ग़ज़ल में भगवान लिखते ही कहां तर्जुमा काफिर हो गया.

भीड़ से निकल, एकान्त किस लिए है हम तभी एक होंगे, अकेले अकेले।

बड़े खुदगर्ज़ हो मियाँ,
अकेले अकेले।

उसे भगाकर तन्हाई लूट रहे हो,
अकेले अकेले।

थे तो ग्यारह, ऐंठ मार गई मियाँ,
अकेले अकेले।

एक ही चना है पर आँख फोड़ सकता है
अकेले अकेले।

पटरी बैठा लो, गाड़ी सर्र जाएगी,
अकेले अकेले।

भीड़ से निकल, एकान्त किस लिए है,
हम तभी एक होंगे, अकेले अकेले।

हमारी खुशी का ठिकाना नहीं रहा बस बात हो गयी,                       कोई समझाए उन्हे ये मुहावरा नहीं है।

ये हरकतें तुम्हारे जूनून की जिस्मानी नहीं हैं
गो पैराहन हवा ले गयी है पर हम नंगे नहीं है।

गमों से इतने घिर गये तो उसने हमारी बात का अन्दाज़ा गलत लगाया,
हम जब नशे में कह गये कि हमारी खुशी का कोई ठिकाना नहीं है ।

‘Pressitude’ आजकल नखरा नहीं attitude बिकता है, जो चाहो उगलवालो इन्हे नोट मार मारकर।

धन्धा बुरा नही जहां होड़ लगी हो पत्थर बाजी के इलावा भी,
मैं तरो-ताज़ा गालियाँ बेचता हूं चाहे देख लो आजमा कर।

वो कोठे पर खड़ी हो कोई pressitude जैसे 
ग्राहक कोई दरवाज़े पर दस्तक दे रहा हो अखबार मारमार कर ।

परदेस तक म़े चर्चा है वो परदे के भीतर भी nude नहीं है 
बिना चैनल के ये कौन सी फिरदौस है ज़रा संभल देख-भाल कर।

मेरे ग़मो की तुझ से क़ुरबत* रही, वर्ना कबके हम ख़ुशी से मर न जाते।

मेरे ग़मो की तुझ से क़ुरबत* रही, 
वर्ना कबके हम ख़ुशी से मर न जाते।

बस उस एक टयाले^ पर आराम मिला,
बीच में पड़ता था घर से मन्दिर आते जाते।

दिल साफ हो तो इबादत के तरीके नहीं देखे जाते,
इश्क सब कुछ निगल चुका था महूरत# बताते बताते।

^ट्याला-चबुतरा या टीला जहां बैठकर पथिक चैन की सांस लेता है।
*closeness

#शुभ समय

तीन तलाक क्यों?  हम ये समझे है कि ‘चौथा’ है, तीन के बाद तलाक हो रहा है। 

आज का विचारः तीन तलाक क्यों?
हम तो ये समझे थे कि चौथा, 
निकाह हो रहा है।

आधी दलीलों पर जिया जा रहा है,
इन रहनुमाओं पर खुदा रो रहा है।

हम तो समझे थे बरसात में बरसेगा बादल,
ये क्या हुआ कि पानी तेजाब हो रहा है।

नुस्खा मर्ज़ के हिसाब से चारासाज़ ने लिखा,
मर्ज़ और मरीज़ छूटें, सुना है तिमारदार से तलाक हो रहा है।

मेरे चेहरे को पढ़ कर तस्वीर बोलती है, दर्द ब्याँ करने के भी आदाब हुआ करते हैं।

पहले

दर्द को द-र्-द लिखकर

अपनी पीड़ा को मापा मैने,

फिर

चुप्प के से 

“मौन”

का पत्थर उछालकर

मन की शान्त झील में

एक कंकड़ फैंका मैने।

तरंगो के साथ

पत्थर तह तक  डूबा

तब जाके चोंच भर 

गहराई का 

पानी पाया मैने।

………
चकमक पत्थर के टकराने से,

निकली एक चिन्गारी

और

प्रकाश दे गई।

ठोकर खाकर सम्भलना मेरा

सार्थक हो गया।

…………