हमने तो जान फूंक दी मुर्दे में, अस्थि को जो पिंजर समझे मस्त है आग लगाने में।

आओ हाथ सेकते हैं
ठण्डे बस्ते में एक मुद्दा पड़ा है।
मैं भी फसल बचाने निकला ,
जो देखा खेत में अकेला बिजूका* खड़ा है।
Scare crow*

To protect the Nature
“For those who do not feel the heat of
Global warming as warning ”

Koshish Karne walon ki Kabhi haar Nahi Hoti,
Mombatti mein Prakash hai maan lo, usme aag Nahi Hoti.

I just depict it in my one liner
“Bonsai a piece of decoration
Or a sucking business”
मेरी कविता प्रकृति का एक अंश हैं,
उसे भी बचाना है जिसमें सर्प-दंश है।।

“उजड़ जाए न ये प्रकृति उस पेड़ की तरह,
बैठक में सजा हो ‘ठूंठ’ बानज़ाइ की तरह।।”

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मैंने उसको पहली दफा लाइब्रेरी में देखा था, तब से उसकी किताब बनाकर लाइब्रेरी में रख छोड़ी है।

मैंने उसको पहली दफा लाइब्रेरी में देखा था,
तब से उसकी किताब बनाकर लाइब्रेरी में रख छोड़ी है।

धूल सी loyal है वो
झाड़ता हूं फिर गर्द सी जम जाती है।
कई सालों से विरह से दोस्ती है मेरी,
झाड़कर भूल जाता हूं फिर नई परत सी जम जाती है।

क्या नारी तुम अबला हो या चंचल शोख चपला हो।

मै अव्यक्त हूं तुम खोजो,
जब तुम्हे पूर्ण लगूं, कृतार्थ* मैं हो जाऊंगा।

*कृतार्थ एक प्रकार की प्रसन्नता या संतुष्टि होती है तथा जब किसी का कोई कार्य या उद्देश्य संपन्न हो जाता है तब वह मनुष्य इस भानात्मक संतुष्टि का अनुभव करता है।

कुछ फर्ज़ ऐसे भी होते हैं कि कोई हाल पूछे तो, हम ना कहेंगे ठीक ठाक हैं कोई हाल पूछे तो।

मुझसे मिलकर इतना न हुआ
तुमसे
कि यूंही कह देते
“मिलकर खुशी हुई”
एतिहातन फर्ज़ था कुछ तो शनासाई का।

एतिहातन formality
शनासाई intro….

दुष्यन्त कुमार एक महान व्यक्तित्व।

दुष्यन्त कुमार आपको सलाम।

ये मेरी एक भेंट समर्पित आपको।

आखिर उसने नाव बहा दी पानी में,
वो कागज़ की थी हां वो कागज़ की ही थी।
खत लिखता था रोज़ पर पता कहाँ लिखता था ,
ये वही पीड़ा थी हाँ वो जन-मानस की ही थी।

…………….

तुम मुझसे रोज़ वही शेर सुनती हो,
और मैं कहता हूं लो गज़ल मुकम्मल हुई
तो तुम कहती हो
मैं बाकी हूं अभी पूरी कहां हुई।

उसको इन्तज़ार है उस मकते* का
और मैं नाम नहीं लेता,
पहले मर्सिया* कौन पढ़ता है
अभी कयामत कहां हुई।

*मर्सिया का अर्थ है मरने वाले को याद करके रोना और उसके गुणों को याद करना. और मकता गज़ल का आखिरी शेर जिसमे कभी-२ शायर अपना नाम बोलता है।

मैं गुनगुना लेता हूं

इक धुन में रहता हूं
उसको भी कुछ-२ अन्दाज़ा है
बिना शब्दों के
वो तर्ज़ में कहां हुई।

और जो लफ्ज़ जोड़ती है गज़ल,
उनसे सांसे उखड़ रही हैं,
आलाप के बिना
फिर जिगर में जान कहां हुई।

जब तक जान थी पत्तों में
पतझड़ भी बहार हुई
अब रास्ते पर आ गई है,
सब जगह बिखरी है
पेड़ों पर लूटपाट कहां हूई।

………।।।।………..

तौबा के बाद का वो गिलास आज भी अल्मारी में रखा है,
वो गिलास आज भी वैसा ही है उम्मीद से टूटा नहीं है।

“अब ये शराब मिलकर कोई साज़िश रच रही है शायद, ये ग्लास क्यों नहीं उठ रहा है जाम जम गया है शायद”

गुलदस्ता ज़िन्दगी, चिराग बंदगी
मैं सोचता हूँ छोड़ दूँ थोड़ी दरिंदगी ।
सिगरेट, शराब है इफरात शबाब है,
सादगी का भी नशा चख थोड़ी जगह दे रिन्दगी।
चाहतों का सिलसिला, शौक बिगड़ने लगे,
रवैया घर कर गया मन्दिर में छोड़ी ज़िन्दगी।

फूल तोड़कर घर की बैठक में गुलदस्ता सजा लेते हैं,
ये वो सलीका है कत्ल करके भी लोग इतराते हैं।

मैं तो केक पर जलती मोमबत्तियां देखकर सोचता हूं,
जैसे आगजनी के बाद अधजली ख्वाहिशें टेबल पर छोड़ जाते हैं।