Media

मीडिया बहस चाहता है,
बहस के लिए आपका कीमती समय चाहता है।
नम्बर वन पर बने रहने के लिए
मुद्दे को दिलचस्प तरीके से भटकाना चाहता है।

क्या तवा जानता है, रोटी किसकी है।
गर सीधे तवे पर अच्छी पक रही है,
तो वो रोटी उल्टे तवे की चाहता है।
फिर वो फुल्का हवा में उछालना चाहता है,

अब वो “फैसला”

सूप्रीम कोर्ट से चाहता है।

“योगा डे” पर कोई शीर्षासन कर रहा था,
वो उसे चमगादड़ का वंशज बताना चाहता है।

हर कोई अपना उल्लू सीधा कर रहा है, और
पिछले दरवाजे से पहले लक्ष्मी पूजना चाहता है।

ये मिडिया क्या चाहता है
गूंगो के मुंह में शब्द ठूसना चाहता है।
सब भ्रांतियों में एकता लाकर,
एक सच्च का बलातकार नकारना चाहता है।

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मैने नहीं देखा ये चमड़ा किसका है।

मैं गुरूद्वारे में बैठकर सबके जूते पालिश कर रहा था,
मुझको ये सोचने का वक्त नहीं था कि किसको सलाम करना है किसको नहीं करना है।

Pendulum ‘tick-tock’ can’t u c is a sign of language without arm @keep moving.

वो बेसुधी में कितनीं पते की बातें करता है,
नशा बुरी बला है, रट कर समझाने की बात करता है!

नशा चुनुं या खुद को चुनूँ ओ स्वावलंबी*,
पैण्डूलम घड़ी के साथ वक्त को चलाने की बात करता है।
*आत्मनिर्भर

“जागरूकता” लिखा, समझा नहीं, “warning’ लिखकर छोड़ दिया।

“जागरूकता” लिखा, समझा नहीं, “WARNING” लिख कर छोड़ दिया।
दिए में आग है इस डर से उसे रौशन न करे कोई। बहुत भूखा है मेरे गांव का किसान कहो तो खेती न करे कोई।।

उसको बीमारी यही है कि वो समझता है वो ठीक है,
ऐसे को उसके हाल पर छोड़ना इलाज नहीं है।

एक गांव वाला पढ़-लिख कर जब हस्पताल पहुंचा,
कहने लगा सब मर गये अब उस गांव में कोई ओझा बचा नहीं है।

कब बरसेगा अम्बर से पानी कहना मुश्किल है,
ग्लेशियर बता रहे थे उसका रिश्ता प्रलय से है अब पानी से जमता नहीं है।

मैं एक किताब भी हूं, मुझे भी पढ़ा कर कभी।

मैं खुद आया हूं अपनी किताब लेकर,
मैने माथे तिलक लगाया है हाथों मे कुरान लेकर।
तू मेरा किरदार बता, ले कलम देता हूं,
मेरे मौला ने तकदीर लिखी है, अपना हाथ जगन्नाथ लेकर।

मै खुद आया हूं अपनी किताब लेकर…
प्रश्न तो सारे इसी किताब से थे फिर क्योंकर तू फेल हुआ
चल आ अपना-२ बचाव करते हैं, पैरवी करेंगे डिग्रीयाँ लेकर।।

मैं खुद आया हूं अपनी किताब लेकर….
ये कागज़ पन्ने भारी गत्ते उनका मैं आभार हूं,
तर्कों ने कुछ वार किए हैं मैं कहाँ जाता अपनी विज़डम लेकर।

मैं खुद आया हूं…
तिनका तिनका लेकर सबने सहेजने का सलीका भी न सीखा,
मैं उन्हे उलझना सिखा रहा हूं, हाथों में घौसला लेकर।