By not minding his business: doing business

आजकल मन खिन्न है, पहले से भिन्न है,

मेले में मन पूछ रहा है क्या यही तका-धिन्न है।

प्यार से नहीं रकीब छीन कर लाया है,

दोस्ती का भरोसा आजकल छिन्न भिन्न है।

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ULTIMATE    परम THE ULTIMATUM अन्तिम चेता-वनी

ULTIMATE परम

THE ULTIMATUM अन्तिम चेता-वनी

तब कैसा लगता है जब तुम्हारे बस में कुछ नहीं

होता,

सच सच बताना क्या तुम्हारा मन भगवान को

प्यारा होने का नहीं होता।

मैं तुम्हे सत्य के जितने नज़दीक ले जाऊंगा,

ये जान ले अन्धकार का जन्म रौशनी के उठने से नहीं होता।

मुरव्वत* चाहिए। त्याग करो, लोग तुम्हें नहीं छोड़ेंगें। *Kind hearted

कोई भी धर्म हो
आप कितने सयंमी है
इस बात का तब पता चलता है
जब आप majority में हो।
और वो स्थिति और भी गम्भीर है
जब आप majority के करीब हो रहे हो
तब बजाय ये जताने के कि तुम्हारा योगदान बराबर का होने जा रहा है आप ये कहें कि अब राज हमारा चलेगा।
This approach/mindset is dangerous.

कश्मीर से राब्ता (रिश्ता)

एक कहानी।.

कश्मीर से राब्ता

(Crux of the story )

the most important or difficult part of a problem
किसी समस्‍या का सबसे कठिन या महत्वपूर्ण अंश

कश्मीर का मौसम बहुत ठंण्डा है,पर मिजाज़ गरम है।

तासीर की पूछिए तो गोली से गुलाम पत्थर से आवाम है।

तुम्हारा होगा कभी अब ये मेरा मकान है।।

वो मकान ले के समझता अब ये उसका मकाम है।

एक कहानी है
.
मेरे मकान की दो छतें हैं।

एक छत पर चील कौओं का पेट भरने के लिए,उन्हे छीचड़े मीट डालता हूं
दूसरी छत पर दाना डालता हूं,
कबूतरों चिड़ियों को पालता हूं।

जिस दिन मेरी आमद नहीं होती या बहुत कम होती है मैं कबूतरों चिड़ियों के साथ भूखा रह जाता हूं।
इन चील कौओं को कोई फर्क नहीं पड़ता, मै मन मसोस लेता हूं क्योंकि उस दिन कुछ कबूतर चिड़ियों को जब मैं गिनता हूं तो गिनती में उन्हे कम पाता हूं।

कभी कभी सोचता हूं ये migratory birds कश्मीर में भी उतरते होंगे। एक दिन दो पंछी आपस में लड़ रहे थे। Local or migratory

लोकल पंछी ने उन्हे बोला “कोई पूछे तो कहना जिहाद है वरना दोनो मार दिए जाओगे।” अभी एक के बचने की गुंजाइश है।

कल कोई कश्मीर से दो जख्मी कबूतर छोड़ गया है घर पर,
एक चिड़िया मुफ्त में उड़़कर चली आई है कहती थी फरीदाबाद में कोई उसका इन्तज़ार कर रहा है देखता हूं उसे शायद दूसरा ठिकाना मिल जाए। एक कश्मीर फरीदाबाद में भी बसाया जाए.

बड़ा मुश्किल है अलग दिखना,
खुदा बना दूं पत्थर रहोगे।

ज़मीं का हिस्सा है जन्नत बना दी,
रुख्सती से पहले इच्छा थी क्या कश्मीर चलोगे।

“उसके हिसाब का लुत्फ कोई और उठाना चाहता है,
कश्मीर में रहकर जन्नत का करम चाहता है।
मेरा हादसा होते-२ कई बार रह गया,
खुदा न जाने मुझे अब किस मुश्किल में डालना चाहता है।”

।ःः

मुद्दा है ही नहीं, माद्दा चल रहा है।

जिन्हें तबियत के मुताबिक नुक्स नहीं मिल रहा है,
तो समझिए उन्हें उनका रकीब ठीक कर रहा है।

इधर संसद में सुनी कहां, कहासुनी सबकी,

और उधर कश्मीर में आजकल क्या माजरा चल रहा है?