डा. ए पी जे अब्दुल कलाम

डा. ए पी जे अब्दुल कलाम आज हमारे बीच नही रहे। एक अदभुत व्यक्तित्व, शब्दो मे जिस व्यक्त नही किया जा सकता। सियासतो से परे,धर्म से भी ऊपर
एक ऐसी छवि जो एक पमशहूर गीत की पक्तियों की याद दिलाती हैं
“न मैं हिन्दू बनूगा न मुस्लमान बनूंगा,
इन्सान की औलाद हूं इन्सान बनूंगा।”

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एक सच्चा किस्सा

यह बात उन दिनों की है जब मैं छठी क्लास में पढता था। हमने इंग्लिश छठी से ही पढना शुरू की। मेरा एक दोस्त जिसका नाम मौहम्मद था वहुत ही बढिया अंग्रेजी बोलता था  और हम उस वक्त ए बी सी सीख रहे थे। मैने उससे कई बार पूछा कि भाईजान इतनी बढिया अंगरेजी कैेसे बोल लेते हो । वो हंस के टाल देता था। कहता था इंग्लिश बोलने वालों के बीच रहा करो, इंग्लिश फिल्मे देखा करो तो बोलना आ जाएगी। वगैरह वगैरह़़

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अलग अलग चिराग

:एक गजल:

अलग अलग चिरागों ने

” रौशनी “

                     कहीं कम तो कहीं ज्यादा दी,

                           और जब बुझ गये तो

                      सबने अन्धेरा बराबर  बॉटा है।

  • मैने देखा ही नहीं महसूस भी किया है 

अन्ध विश्वासो  ने विष्वास

ज्यादा  बॉटा है।

कभी सुना है कि नदी का पानी,

तैरना नही डूबना सिखाता है।

सैकडों पार हो गयै, फिर लौटेगे,

पर सवक वो एक डूबने वाला सिखाता है।

कितनी गर्दिश मे है फिर भी सर उठा के जीता है।

कमल ही को देखिए, कैसे कीचड में खिल खिलाता है।

उतरने लगी शराब तो फिक् ये हुआ कि  अब पैर सम्भल जाएगें।

होश में बस यही बडी दिक्कत हे कि ये तकलीफें बहुत बढाता है।

वो जो चिराग ले के ढूंढते हैं मेरे दर्द का सबब।

मेरी टीस का उठना बैठना एसे

जैसे अन्धेरों मे कोई जुगनु टिमटिमाता  है।

वो उतावला बहुत था, फुर्सत से इश्क कर बैठा,

अब एक ब्राहमण ने कहा है आंकडा ये छतीस का बनता है।

मुझपे जो गुजरी है, वो क्या कयामत समझती है,

पतझर और टूटने मे फर्क, मौसम नही शजर जानता है।

ख्वाबगाह (वो जगह जहाँ आप सोते/ख्वाब लेते हैं)

Khwab Gah

पृष्टभूमि मेरे घर और श्मशान के बीच में एक पार्क पड़ता है। सुबह सैर करते हुए कुछ चेहरे, मुझे रोज़ मिलते हैं। उनमे,  कुछ हँसते मुस्कुराते मिलते हैं जो शायद मुर्दा हैं क्योंकि जो उदास  हैं उनका पक्का है कि वोह जिन्दा हैं।  अब ज़िंदगी पहचानना मुझे आसान हो गयी है, एक मुश्किल थी सो हल हो गयी है।

जितना मरोगे  बस उतना ही  –  स्वर्ग तुम्हारा है। तभी मेरी बगल से एक फलसफ़ी (फिलॉसफर) ये कहते हुए गुजरा की

“दोज़ख़् (नरक) में भी रकखे हैं खुदा ने कुछ पढ़ने पढ़ने वाले लोग,

ए वाइज़ तू जिस जन्नत के ख्वाब दिखता है हमें,  लोग उसे मुग़ालता (गलतफहमी) कहते हैं।”

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