ख्वाबगाह (वो जगह जहाँ आप सोते/ख्वाब लेते हैं)

Khwab Gah

पृष्टभूमि मेरे घर और श्मशान के बीच में एक पार्क पड़ता है। सुबह सैर करते हुए कुछ चेहरे, मुझे रोज़ मिलते हैं। उनमे,  कुछ हँसते मुस्कुराते मिलते हैं जो शायद मुर्दा हैं क्योंकि जो उदास  हैं उनका पक्का है कि वोह जिन्दा हैं।  अब ज़िंदगी पहचानना मुझे आसान हो गयी है, एक मुश्किल थी सो हल हो गयी है।

जितना मरोगे  बस उतना ही  –  स्वर्ग तुम्हारा है। तभी मेरी बगल से एक फलसफ़ी (फिलॉसफर) ये कहते हुए गुजरा की

“दोज़ख़् (नरक) में भी रकखे हैं खुदा ने कुछ पढ़ने पढ़ने वाले लोग,

ए वाइज़ तू जिस जन्नत के ख्वाब दिखता है हमें,  लोग उसे मुग़ालता (गलतफहमी) कहते हैं।”

अभी दो दिन हुए उसी पार्क में  मेरी नज़रें,  मेरी ज़िन्दगी से मिली। जब तीसरे दिन मिली तो बोली “दो दिन और बचे हैं ज़माने को खबर हो गयी है ” क्या! ये मेला सिर्फ चार दिन का था, हद हो गयी है। जाते -जाते एक सवाल छोड़ गयी  बोली “ज़िंदगी और मौत के बीच में  दूरी अगर एक उम्र की है, तो मालूम करो कि मंज़िल तक पहुँचने का सबसे आसान रास्ता कौन  सा है? हल तुम्हे खोजना है।

–  संकेत है – कि तुम ज़हर नहीं पिओगे।  

पहला दिन जलवे का, दूसरा इंतज़ार का,

तीसरा मिन्नतों में, चउथा शिद्दत का निकला।    

जब तक कुछ पता लगता , आगाज़ निकल गया ,

बीच में बस दवा थी, अंत में दुआ का निकला।  

उसी पार्क में कई दरख्तों झाड़ियों से घिरा एक झुरमुटा सा कोना।  दिन हो या रात वहां अँधेरा रहता है। शांति  नहीं सन्नाटा रहता है। उसी अँधेरे में चांदी के वर्क  पर लेटी, श्वेत बर्फ सी, जीवन की धूल अपने नथनों से खिंचनें की कोशिश में लगे कुछ बच्चे धुआं हो रहे हैं. यही वो अँधेरा है – ज़रा सी आँख उठाओ तो लगता है जैसे किसी दीये के तलेटे में बैठे हैं। मैंने उस अँधेरे से झुरमुटे में अपनी गर्दन घुसाई और पूछा  “ये सब क्या है?’ एक आवाज़ आई “एक किरदार” जो खुदा ने बक्शा है जिसका है उसे निभाना हैं। उसकी मर्ज़ी के बिना तो एक  पत्ता भी नहीं हिलता फिर हम तो निमित्त मात्र है। ये रंगमंच है साहब और पात्र के हिसाब से आप सैर कीजिए और घर पर कोई बाट जोह रहा  है घर जाइये। उन आत्माओं ने जैसे मेरा शरीर तो लौटा दिया पर आत्मा अभी भी मेरे साथ घर नहीं पहुँची है.  और उसके अगले दिन से मैं भी रोज़ लोगों को हंसते मुस्कुराते चेहरे के साथ मिलता हूँ।

सूत्रधार ने मेरी नींद ज़रा लंबी कर दी थी, अब मेरा पात्र उसकी पकड़ से बाहर है।

*********

 बड़े दिनों बाद “रक़ीब” का जो किसी ने नाम लिया तो

दिल के किसी कोने में एक प्यारा सा अक्स उभर आता है।

क्या ज़माना आ गया, खुदा के नाम से खुदा नहीं,

कोई क़ाफ़िर* का नाम ले ले तो खुदा याद आता है।

मेरे घर में भी एक लक्ष्मी है , रोज़ दाल बनती है ,

मसालों  की महक से पड़ोस की भाभी का मुर्गा याद आता है।

मैं हमेशा दिल्ली में पड़ता रहा और लोग मुझे समझ नहीं पाये ,

बल्लीमारान की तंग गलियों से जो गुज़रा तो मुझे ग़ालिब याद आता है।

*क़ाफ़िर- खुदा को न मानने वाला

पृष्टभूमि:  अपने किसी निकटतम की मृतयू पर मै सफदरजग शमशान पर था। उसके एक तरफ पार्क है। जहॉ मै बैठा हू और दूसरी तरफ मकान है। मकानो की बालकोनीया शमशान की तरफ है। चिता जल रही है। मै पार्क मै बैठा कुछ सोच रहा हू। उधर बालकोनी मै लोग बैठै चाय पी रहे है। एक बच्चा हाथ उपर िकये उस जल्ती चिता को देख रहा है, मानो हाथ सेक रहा हो। पार्क मै लोग सैर नही मानो आदतन घूम रहे हौ। अचानक एक बुजुर्ग मेरी वगल मे आकर बैठ गया। पूछता है कोइ मर गया क्या। सो confident, सोचा इसको कैसे पता। तब सोचा कि इस बस्ती के लोग, बच्चे सब  जिन्दगी और मौत को सच मे एक खेल के रूप मे लेते है।  उपर भी भीड बहुत है। कु छ यहा घूमने भी आते होगे। कैस पता लगे। रोज आओ इस पार्क मै तुम भी पहचानने लगोगे़।

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