खर-पतवार : (plant unwanted)

मजबूरियों के खलिहान

और

खुशियां खर-पतवार सी,

क्या उखाड़ना था, क्या उखाड़ बैठे।

 

मुझे रोशनाई की ज़रूरत थी,

वो शम्मा जला बैठे ,

क्या संवारना था, क्या संवार बैठे।

 

कितनी दरारें हैं

मकान और रिश्तों के बीच,

इक लकीर सी अब भी दिखती है,

कई बार मिटा बैठे।

 

शीशे में जो बात है,

आईने में कहाँ,

एक छवि को संवारना था,

खुद को उतार बैठे।

 

नसीहतों से हमने क्या कुछ नहीं सीखा

जिन धागों को तोड़ना था उनमे मोती पिरो बैठे,

दहेज़ के हाथों ये क्या थमा बैठे,

रिश्तों को पाना था, हम सब कुछ गँवा बैठे।

 

समय हर रोज़, रात की पूछी पहेली बुझा देता है,

तरक्की का सूरज क्या कुछ जला देता है,

सदियों से मेरे गाँव की एक पगडण्डी, सादगी से शहर की ओऱ

जिन रूढ़ियों पर बनी थी, हम लौटे तो उस पर रोड़ी बिछा बैठे। 

दम-भर की ये ज़िंदगी,

जैसे चिलम जला रक्खी है,

कुछ धुआं की, कुछ राख कर दी हमने,

कुछ गीत गुनगुनाने थे, ये हम क्या गुड़गुड़ा बैठे।

 

गीले शिकवों में उलझे रहे,

कितने मौसम गुज़ार बैठे,

ज़िंदगी बीचों-बीच बहती रही

नदिया की धरा की तरह,

हम तमाशबीनों की तरह, किनारा पकड़ बैठे।

 

जब भी मैं तुझसे कुछ मांगू,

तो बस इतना ख्याल रखना,

इतने सुख न हमें देना दाता,

कि हम तुमको भुला बैठें।

 

उसके उगने पर, अंजलि भर-भर के जल चढ़ा देते हैं,

और डूबते सूरज का नज़ारा,  दूरबीन लगा बैठे हैं,

वक़्त-बे-वक़्त ज़रा अपने अंधेरों को भी टटोलिये,

इन उजालों में न जाने कितने जुगनू,

अपनी कैफियत गवा बैठे हैं।

 

 

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