एक सच्चा किस्सा

यह बात उन दिनों की है जब मैं छठी क्लास में पढता था। हमने इंग्लिश छठी से ही पढना शुरू की। मेरा एक दोस्त जिसका नाम मौहम्मद था वहुत ही बढिया अंग्रेजी बोलता था  और हम उस वक्त ए बी सी सीख रहे थे। मैने उससे कई बार पूछा कि भाईजान इतनी बढिया अंगरेजी कैेसे बोल लेते हो । वो हंस के टाल देता था। कहता था इंग्लिश बोलने वालों के बीच रहा करो, इंग्लिश फिल्मे देखा करो तो बोलना आ जाएगी। वगैरह वगैरह़़़़़़़



अब मेरे दिमाग में भी कुलबुलाहट थी।  मैं दूसरे ही दिन दो टिकटे चाण्कया सिनेमा हाल की ले आया।
फिल्म  गॉन विद द विंड । पर खुजली थी वो तो मिटानी थी।  मैने पूछा यार एडजस्ट कैसे करेगे। लल्लुऔं की तरह बैठे रहेगे।  अंग्रेजी फिल्म  है समझ तो कुछ आना नहीं है।  मौहम्मद बोला “मस्त होकर देखने का, कोइ  टैन्शन नही लेने का। जब बगल वाला हंसे तुम भी हंस देना, हूट करे तुम भी हूट कर देना बस।”
फिल्म शुरू हुए अभी पॉच मिनट ही हुए थे कि मै खॉमखॉ हंस दिया। मेरे पीछे-२  ओर भी हंस दिए।
फिर तो हमारा जो हंस-२ के बुरा हाल हुआ, इतना शायद हम कभी पहले नही हंसे थे।  उस दिन मेरे उस दोस्त ने एक बात कही थी कि “गुरू  एक दिन तुम स्टेज पर या लेखन मे कुछ न कुछ अवश्य करोगे बस इस विधा ( आर्ट) को छोडना मत।”

और मैं वो बात पकडे हुए हूं।

(दोस्तों अपनी जुबान/ मातृ भाषा से सभी को प्यार होना चाहिए उसकी इज्जत करनी चाहिए। आज मुझे दुख होता जब किसीसे गिनती(counting) मे से आप कोइ अंक बोलिए वो आपसे अपेक्षा करेगा की अंग्रेजी  में बोले। अपनी भाषा का ग्यान  न दूसरी भाषा की पूरी पकड,  सब कुछ अधर में।  बौना सा करके रख दिया है इस दो कश्तीयों पर सवारी के व्यवहार ने।
जिसे हम बौना कहते थे वो अब बॉनजाई हो गया है।)

अभी मौहम्मद की कहानी अधूरी है शेष अगले भाग मे पढिऐ

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