एक यात्रा

एक बार मै हरिद्वार से रिशीकेष पैदल यात्रा पर गया। रास्ते मे एक भजन मण्डली के साथ-२ चल रहा था। कुछ लोग पूरी मस्ती मे और कुछ महज रास्ता तय करने की गरज से साथ थे। शायद उनकी समझ मे आ रहा था कि रास्ता कठिन हो तो भजन करो। और एसा है भी। रास्ते मे जगह-२ कुछ साधु धूनी रंवाए समाधिष्ट ध्यान लगाए बैठे थे।  हम आगे बढते जा रहे थे। लेकिन वो साधु जो समाधि मे बैठा है शायद हम से कही आगे निकला हुआ है। मुक्ति की खोज  मे। आदमी अकेला है पर वास्तव मे अकेला नही है, और भीड मे होकर भी कितना अकेला है। पर ये सृष्टि इतनी सक्षम है अापका  हिस्सा आपको आपके कर्म के हिसाब से लौटाती जरूर है।

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गुलज़ार साहेब से एक मुलाकात ख्वाब में

Gulzar

कल रात ख्वाब में गुलज़ार साहेब से सामना हुआ मेरे ज़हन की एक गली में। बातों ही बातों में गुफ्तगु कहां ले चली थी पता ही नहीं लगता था। तभी उनकी  कोई ग़ज़ल कोठे पर गुनगुनाने लगता है।

उनकी ग़ज़ल का चौगा अपना फैलाव लिए कब मुझे लपेटने लगता है पता ही नहीं चलता ।पहले तो वो मज़ा देती है फिर सर्द हवाओं के हिसाब से अपना वजन बढ़ा देती हैं किसी मोटी  रिज़ाई की तरह। फिर  थका देती है। फिर मैं अपने को छुड़ाने की कोशिश करता हूँ पर उसका एक एक शब्द अपनी पकड़ से इतना वाक़िफ़ है की  भीतर कुछ तोड़ता तो है पर कुछ भी बिखरने नहीं देता है। मुझे नींद आने लगती है तभी इससे पहले की नींद का झोंका गर्दन को लटकाए इक झटके से झंझोड़ कर चेतना मुझे उठा देती है।

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प्रेरणा

How do you dream

मेरे बचपन की कुछ पसन्दीदा जगहों में से एक स्थान है बिडला मन्दिर जिसे लक्षमी नारायण मन्दिर के नाम से भी जाना जाता है।  लगभग सन् 1969 की बात है। मै मन्दिर के गेट से सटे हुए धर्मशाला के द्वार के बाहर बनी पुलिया पर बैठा हुआ था। कुछ उदास था। क्योकि मॉ का देहान्त हुए अभी १० दिन ही हुए थे। मन्दिर के बाहर सडक तोडकर दुबारा बनाने का काम चल रहा था। पत्थर उखडे पडे थे। मन्दिर के मुख्य द्वार के ठीक सामने टूटी सडक के बीचोबीच एक बडा सा पत्थर उखडा पडा धा। बिल्कुल “शिव लिगं” नुमा।  सडक के किनारे बजरी-रोडी का ढेर लगा था।कुछ मजदूर सडक तोड रहे थे। उस टूटी सडक के बीचोबीच एक मजदूर का बच्चा हाथों में रोडी भरता  और उसमे से चुन-चुन कर एक गिट्टा हाथ मे लेता और उस शिवलिगं नुमा पत्थर पर निशाना लगा रहा था।

लगभग ५ बजे शाम का समय था। मेरा ध्यान उस बच्चे पर केन्द्रित था। वो बार बार निशाना लगा रहा था। जब उसका फेका पत्थर उस बडे शिवलिंग नुमा “पत्थर” पर लगता वो खुशी मे ताली बजाता था। और जब फेका पत्थर उस बडे पत्थर पर लगता तो मेरा ध्यान इस बात पर  भी था कि पत्थर छिटककर कही किसी और को न लगे।

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गजल

 
तू माटी का पुतला, क्यों ऑख तेरी पत्थरा गई,
सिर्फ राख जंहा बनती है जरा देख उस श्मशान को।
टेक़़…

टूटते तारे को देख, उसे एक विश्वास से,
कुछ इस तरह जोडा हमने
जैसे देता है , बाद मरने के कोई 
वसीयत किसी अरमान को।

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बंट जाना प्रसाद की तरह

अगर तुम्हे बंटना ही है
तो बंट जाना,
पर विभाजित मत होना
हिस्सों की तरह।

बिखर जाना
श्रध्दा-सुमनों सा
फिर सबको मिल जाना
प्रसाद की तरह।

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एक सच्चा किस्सा (पार्ट – २)

2

यह बात उन दिनों की है जब मैं छठी क्लास में पढता था। हमने इंग्लिश छठी से ही पढना शुरू की। मेरा एक दोस्त जिसका नाम मौहम्मद था वहुत ही बढिया अंग्रेजी बोलता था और हम उस वक्त ए बी सी सीख रहे थे। मैने उससे कई बार पूछा कि भाईजान इतनी बढिया अंगरेजी कैेसे बोल लेते हो । वो हंस के टाल देता था। कहता था इंग्लिश बोलने वालों के बीच रहा करो, इंग्लिश फिल्मे देखा करो तो बोलना आ जाएगी। वगैरह वगैरह़।

२० जुलाई के लेख से आगे…..

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एक गजल

देखना उनका तिरछी नजरों से  ईशारा है मुझे,

सीधी आखों से निशाना कहॉ लगता है।

 

कम-२ पिया करो, हदसे गुजरी तो बिगड जाएगी,

एक एैबी ने दिया है, मशविरा अच्छा है।

 

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