एक सच्चा किस्सा (पार्ट – २)

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यह बात उन दिनों की है जब मैं छठी क्लास में पढता था। हमने इंग्लिश छठी से ही पढना शुरू की। मेरा एक दोस्त जिसका नाम मौहम्मद था वहुत ही बढिया अंग्रेजी बोलता था और हम उस वक्त ए बी सी सीख रहे थे। मैने उससे कई बार पूछा कि भाईजान इतनी बढिया अंगरेजी कैेसे बोल लेते हो । वो हंस के टाल देता था। कहता था इंग्लिश बोलने वालों के बीच रहा करो, इंग्लिश फिल्मे देखा करो तो बोलना आ जाएगी। वगैरह वगैरह़।

२० जुलाई के लेख से आगे…..

मेरे उस दोस्त में कुछ तो बात ऐसी थी जो उसे बाकी दोस्तो से अलग करती थी।

फिर एक दिलचस्प वाक्या हुआ। स्कूल में फैन्सी ड्रेस का आयोजन हुआ ।उसमे आप कुछ भी बनें या दो तीन मिनट का कोई स्किट करे। बस फिर क्या था मौहम्मद ने एक छोटा सा आइटम तैयार किया और हमे सि़र्फ दो सैकण्ड के लिए एक पात्र के रूप मे लिया। नाम पुकारा गया और मौहम्मद मंच पर – एक मैली सी बनियान मे बूटपालिश करने वाले की भूमिका में नीचे पालिश की पेटी लेकर बैठ गया। दूसरी तरफ से मै मंच पर आया और पेटी पर पैर रक्खा पूछा “क्या लोगे”। बोला जो दे देना साब और पेटी की साइड से अखबार निकाला और बोला तब तक आप ताजा खबर पढें मैं पालिश करता हूं।

उसकी यही बात उसे बाकी पालीश वालों से

उसे अलग करती थी। पहली खबर पर नजर पडी।

“कल बाल-मजदूरी के खिलाफ प्रदर्शन”।

मैने पूछा तुम्हारी उम्र क्या है। मुस्कुराते हुए बोला” साब ये प्रदर्शन बाल मजदूरी के खिलाफ है बाल मजबूरी के खिलाफ नही है। मै कमाउंगा तो दो वक्त की रोटी चलती है साब। पटाक्षेप – पर्दा गिरता है। सारा माहौल तालियों गू्ज उठा।

जाहिर है पहला ईनाम मौहम्मद को ही मिला। स्टेज पर प्रिंसीपल साहेब ने मौहम्मद को बुलाया उसकी दिल खोलकर प्रशंसा की और कहा मै तुम्हारे अभिनय से बहुत प्रसन्न हूं और इसलिये मै दस रूपये का अतिरिक्त ईनाम अपनी तरफ से भेंट करना चाहता हूं। मौहम्मद ने हाथ जोडकर दस रू़पये यह कहकर लौटा दिये कि ” सर इस ईनाम का असली हकदार वो व्यक्ति होगा जिसने वास्तव में एक्टिंग की होगी। मेरा तो धन्धा यही है स्कूल से छूटने के बाद मै क्नाट प्लेस मे बूट पालिश ही करता हूं।”

मैं स्तबध सा खडा देखता रह गया।

यह कहकर मौहम्मद स्टेज से उतरा, कॉधे पर बूट पालिश की पेटी रक्खी और चल पडा अपने धन्धे की ओर। बूट-पालिश की पेटी के पीछे लिखा था –

“आदमी की औकात उसके जूते से पता लगती है और

मैं उसे चमकाना बखूबी जानता हूं।

और हाँ एक बात तो मै कहना भूल गया कि मौहम्मद ‘शिया’ था।/font>


मुझे नही मालूम मौहम्मद आज कहां है क्योकि वो सिर्फ एक साल ही और स्कूल में रहा। फिर स्कूल नही आया। पर मै अपनी इस लिखने की आदत का श्रेय उसी मौहम्मद को समर्पित करता हूं।……….

तुमने टटोला ही नहीं, उन अन्धेरों में बहुत कुछ है।
ये जागीर अन्धेरो की थी दिन पर चरागों ने अपना कब्जा जमा रखा है।

तुम्हे पता है एक जुगनू रात भर नींद म़े खलल डालता रहा है।

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