प्रेरणा

How do you dream

मेरे बचपन की कुछ पसन्दीदा जगहों में से एक स्थान है बिडला मन्दिर जिसे लक्षमी नारायण मन्दिर के नाम से भी जाना जाता है।  लगभग सन् 1969 की बात है। मै मन्दिर के गेट से सटे हुए धर्मशाला के द्वार के बाहर बनी पुलिया पर बैठा हुआ था। कुछ उदास था। क्योकि मॉ का देहान्त हुए अभी १० दिन ही हुए थे। मन्दिर के बाहर सडक तोडकर दुबारा बनाने का काम चल रहा था। पत्थर उखडे पडे थे। मन्दिर के मुख्य द्वार के ठीक सामने टूटी सडक के बीचोबीच एक बडा सा पत्थर उखडा पडा धा। बिल्कुल “शिव लिगं” नुमा।  सडक के किनारे बजरी-रोडी का ढेर लगा था।कुछ मजदूर सडक तोड रहे थे। उस टूटी सडक के बीचोबीच एक मजदूर का बच्चा हाथों में रोडी भरता  और उसमे से चुन-चुन कर एक गिट्टा हाथ मे लेता और उस शिवलिगं नुमा पत्थर पर निशाना लगा रहा था।

लगभग ५ बजे शाम का समय था। मेरा ध्यान उस बच्चे पर केन्द्रित था। वो बार बार निशाना लगा रहा था। जब उसका फेका पत्थर उस बडे शिवलिंग नुमा “पत्थर” पर लगता वो खुशी मे ताली बजाता था। और जब फेका पत्थर उस बडे पत्थर पर लगता तो मेरा ध्यान इस बात पर  भी था कि पत्थर छिटककर कही किसी और को न लगे।

दृश्य नं २ 

समय शाम के ७ बजे थोडा अन्धेरा हुआ। अबकी बार जब फैंका हुआ पत्थर उस   पत्थर से टकराया तो एक चिगांरी सी दिखी।  अब वो बच्चा और खुशी से उछला। मै तो उस चिंगारी का विज्ञानं समझ रहा था। पर  उस बच्चे के लिए एक आविष्कार सा था। उसके बाद  से उसका निशाना बराबर लग रहा था। मानो उस प्रयास का उसे पारितोषिक मिल गया हो। अब सवाल यह था कि घर्षण की ये चिंगारी तो पहले भी निकल रही थी। पर उस दिन के उजाले मे दिखाई नही दे रही थी। जैसे ही अन्धेरा हुआ वो दिखाइ देने लगी। एक बात तो महसूस हुइ कि तर्क जिसे आप ज्ञान  कहते  हैं ज्यादातर कई चीजों की महत्ता  को,चमक को कम कर देता है ।ये  तुलना मैं  अपनी  और उस बच्चे की खुशी से कर  रहा था जो उस चिंगारी के कारण पैदा हुई थी। और यह भी जाना की सत्य  सत्य होता है उसका कोई पक्ष नही होता। जैसे सूर्य जहां तक देख सकता है प्रकाश है। क्योकि वो सू्र्य है उसे अन्धेरे की परिभाषा पता ही नही है। कही आपका यही ज्ञान (प्रकाश) उस परम प्रकाश से जुडने मे बाधक तो नही है। और वास्तविक्ता यही है। आपका अहम् उस ओम से मिलने मे बाधक है। हमेशा  कच्ची मिट्टी से ही घडा जल्दी बनता है।   दूसरे हम जिन्दगी की कितनी  ही छोटी-२  खुशियां  उस स्पार्क की तरह  इस चकाचौंध में हम खो देते हैं हमे पता ही नही चलता है।

आगे जो मै सोच रहा था वही हुआ। अगला फैंका हुआ पत्थर छिटककर मन्दिर मे पूजा के लिए सीढी चडती हुई एक महिला की टांग छूते हुए मन्दिर के आहते में जा गिरा। महिला ने पलटकर देखा। इससे पहले की महिला कुछ कहती उस बच्चे के पिता ने दो तीन थप्पड़ उस बच्चे के जड़ दिए । महिला ने उस पिता को कहा कि आपको उस बच्चे को नही मारना चाहिए था।  उस  बच्चे  की  सोच  तो  उस  सडक पर  गडे हुए गोल  पत्थर  तक ही  है  जिसको  वो  साध चुका है। और वो जो पत्थर मुझे लगा, भटका हूआ, फिर भी छिटककर  पर मुझसे पहले मन्दिर मे पहुंच गया। कितने सालो से मै भी एक पत्थर को साध  रही हूं। मेरी आस्था भी एक दिन एसे ही टकराकर उस प्रकाश को साध  लेगी । देखना एक  दिन जरूर पा लूंगी।  हाँ….  ।

वो मजदूर हतप्रद सा उस औरत को जाते हुए देखता रहा। उसकी समझ में  कुछ नही आया। पर उसके माथे का पसीना मानो किसी प्रकाश – पुंज सा चमक रहा था।

मै उस धर्मशाला की पुलिया पर बैठा इस दृश्य को देख रहा था। मानो कोई  नाटक  चल रहा हो । सब अपनी-२ जगह कितने करीने से अपना किरदार निभा रहे थे। और डोर जैसे उस अदृश्य के हाथ मे हो।

उस वक्त मेरे मूंह से कुछ शब्द निकले और  मैने  उन्हे माला मे पिरोने की कोशिश की।  यही मेरी पहली कविता थी। जिसका शीर्षक है “प्रेरणा”:

चकमक पत्थर के टकराने से निकली एक चिंगारी और

 प्रकाश दे गई,

ठोकर खाकर सम्भलना मेरा सार्थक हो गया।

भक्ति से तपस्या से ध्यान मे उतारा जिसे, 

अनुभूति को शक्ल में ढाला तो

वो पत्थर हो गया।

ये कैसा उजाला है ऑख बन्द करता हूं

तो दिखता है ।

और  ऑख खुलते ही अन्तर  ध्यान हो गया।

पानी की तरह उतरा जब नशा मेरा,

मैं जहॉ डूबा था वही साहिल हो गया।

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4 thoughts on “प्रेरणा

  1. Sunder Shyam Masand says:

    वाह राकेश, तेरा यह रूप तो कभी दिखा ही नहीं, सोम ब्रांच में?👌
    हम जानते थे कि इल्म से कुछ जानेंगे,
    जाना तो यह जाना कि हम ने कुछ न जाना।।

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