गुलज़ार साहेब से एक मुलाकात ख्वाब में

Gulzar

कल रात ख्वाब में गुलज़ार साहेब से सामना हुआ मेरे ज़हन की एक गली में। बातों ही बातों में गुफ्तगु कहां ले चली थी पता ही नहीं लगता था। तभी उनकी  कोई ग़ज़ल कोठे पर गुनगुनाने लगता है।

उनकी ग़ज़ल का चौगा अपना फैलाव लिए कब मुझे लपेटने लगता है पता ही नहीं चलता ।पहले तो वो मज़ा देती है फिर सर्द हवाओं के हिसाब से अपना वजन बढ़ा देती हैं किसी मोटी  रिज़ाई की तरह। फिर  थका देती है। फिर मैं अपने को छुड़ाने की कोशिश करता हूँ पर उसका एक एक शब्द अपनी पकड़ से इतना वाक़िफ़ है की  भीतर कुछ तोड़ता तो है पर कुछ भी बिखरने नहीं देता है। मुझे नींद आने लगती है तभी इससे पहले की नींद का झोंका गर्दन को लटकाए इक झटके से झंझोड़ कर चेतना मुझे उठा देती है।

समय को बाँधने के लिए कुछ बंदिशे जरुरी हैं जैसे कोई मालिश करते हुए दर्द को बस इतना दबाता है की वो मज़ा देने लगती है। फिर कोई बाजार गली में गुनगुनाने लगता है…..

तवाइफ़ का कोठा जगमगाये सारी रात ,

निगलता है अँधेरे कोई धीरे धीरे।

गिर के उठो या फिर उठो सोते सोते

सभी को मिलता है सूरज सवेरे सवेरे।

जब से पता लगा ये गुत्थी गुस्से से न सुलझेगी

तब तक लूट ले गया प्यार से कोई सांझो-सवेरे।

गली में बच्चा माँ की गोद में भूख से तड़प रहा था, आज पहली दफा महसूस हुआ की माँ की गुदगुदी भी हंसाने के काबिल नहीं रही।

 यह ख़्वाब उनके जन्म दिन वाले रोज़ आया था तभी कुछ देर के लिए समझ आये वर्ना वो पकड़ में कहाँ आते हैं। अभी ऑख खुली नही थी खाब टूटने को था।

नब्ज मत टटोल मै अभी ख्यालो मे जिन्दा हूं,

जुबान के नीचे दबा दिये है खुमार सपनो के।

बस एक शीशे में पारा संजो के रखा है,

बर्फ की मात्रा समझती है मायने खुराकों के।

बाहर ठंड थी और बादल भी थे। फिर भी खिड़की से धूप आ रही थी। मन्द-मन्द  हवा ने हल्के से कान में बुदबुदाया ये धूप किस गुलज़ार ने भेजी है। आसमान के आफताब का तो पता  नहीं।

नोट:

ख्वाब में बिखराव दीगर है, उसे समीक्षक के मायना नहीं मालूम

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