मयखाने में आलमी चर्चा : कुछ मेरी सुन कुछ अपनी सुना

Credit: Deviantart

 सोचा एक ग्लोबल चर्चा रखी जाए और वो भी मयखाने में. जहाँ मुद्दे की कोई बंदिश नही. सब जी खोलकर किसी भी टॉपिक पर बात कर सकते थे। 

वेन्यू : मद्र्से (स्कूल के करीब दो सौ मीटर दूर) एक बोर्ड मयखाने का रास्ता दिखा रहा था,

कोई भटकेगा नही एक तीर उंगली के इशारे में  राह दिखा रहा था। 

गेस्ट : मयखाने की आलमी चर्चा मे नामीगिरामी  सामाइन शामिल थे,

रिंद, शैख़, साकी, वाइज़ और  कुछ क़ाफ़िर कुछ कामिल थे,

कारण :  मयखाने की भी अपनी एक दुनिया है जहाँ जज़्बात बनावटी नहीं होते। 

“कोई यार नहीं कोई रक़ीब नही, ये कौन सी जगह है पता कीजे,

कोई अपना न पराया, न ही कोई सियासत, ये मयखाना है या काबा पता कीजे।”

ये पार्टी जब शुरू हुई तो साकी जिस भी मेज़ से गुजरा उस गुफ्तगू का आँखो देखा कानो सुना नज़ारा कुछ ऐसा है

जैसे कोई शम्मा सामने रख दे और परवाना मशगूल हो अपनी रोशनी में। 

टेबल न १

दौर चले शराब चली, सब हैरान थे जब बात चली

बेतरतीब थी टुकड़ो में थी, जुड़ती गयी  आसमान चली

दिल की दिल मे रह जाती वो एक पुरानी हसरत थी,

होश वालों के होश उड़े जब मदहोशी मे भाईचारे की बात चली। 

टेबल न २

ये हंगामा है क्यों बरपा काश गुलाम अली को बुला लिया होता,

तक्सीम न हुए होते गर अली जिन्हा को जाने न दिया होता

वो पीपल जिसे पूजते है हम मंदिर के अहाते में,

दरअसल दरारों को भरता है, वो दीवारों पर नहीं उगता। 

टेबल न ३

एक ज़मीन पे  कितनी सरहदें हो सकती है,

एक घर में जितनी दीवारें हो सकती हैं

क्या किसी ज़लज़ले का इंतज़ार है हमको,

एक आगोश है जिसकी, वो कुदरत हो सकती है। 

टेबल न ४

ए साक़ी तू दर्द से जुड़ा रह, तेरी उमर लंबी होगी

खुशी कभी पल दो पल से ज़्यादा का भरोसा नहीं देती.

अर्रे ए शायर साहेब आप भी तो कुछ फरमाए सब एक हैं किसी तख्लुस की ज़रूरत नही,

तो लो हम भी फरमाते हैं अपने हस्ती को मिटाकर। 

“हमने तेरे बगैर भी जीकर के दिखा दिया

अब ये सवाल क्या है कि फिर दिल का क्या हुआ* (अख्तर सइद खान)

हम तो शराब की तरफ गये, शराब के लिए नहीं,

मयखाने में बैठकर नमाज़ पढ़ी फिर पूछते हो जन्नत का क्या हुआ

अब मज़ार पर दिया जला के बैठते हो

फिर ये चाहते हो कोई ये न पूछे की उस शख्स का क्या हुआ।”

टेबल न ५

मेहमान शैख़ रिंद ज़ाहिद जो चुप से बैठे है वाइज़ कुछ देर से आए सीढ़ी उतर रहे थे

किसी न फरमाया

ये मयखना है वाइज़ यहाँ ज़रा सम्भल कर उतरना,

ये मंदिर की सीढ़ी नही है जो फिसले तो स्वर्ग मिल जाएगा। 

ए वाइज़ तूने शराब नही पी, अछा ही किया,

ज़हर ज़हर को मरता है ये लोग कहते है,

दोज़ख़् में भी रखे है खुदा ने कुछ पढ़ने पढ़ाने वाले लोग,

वाइज़ तू जन्नत के खाब दिखा रहा है, हम लोग उसे मुग़ालता कहते हैं। 

टेबल न ६

मयखाने मे कुछ और भी मिलता है, सिर्फ़ शराब नही मिलती,

इन अंधेरो में भी एक ठिकाना है कही और भटकने की गुंजाइश नही मिलती। 

रही सही कसर कहीं,शराब छूटने के बाद,

दारू दवा के तौर पर, चम्मच से शराब पिलाई गयी

उतरने लगी तो फ़िक़र हुआ, अब कदम संभल जाएँगे.

होश में बस यही दिक्कत है, गल्त उम्मीद फिर लगाई गयी। 

टेबल न ७

मेरी बात मेरा पैमाना रखता है,

जब मैं होश में नही होता तो वो अपने को खाली रखता है

जब भी कभी ज़रूरत पड़ी, वो ख्याल रखता है

उसकी याद तभी आती है, जब वो तबीयत मेरी नासाज रखता है। 

मैं टूटा हुआ नही हूँ, ज़रा गौर से देखना,

मुझको अपने आईने से अलग करके देखना। 

मंदिर हो या मस्जिद, दोनो को श्रद्धा से देखना,

पूजा-इबाबत को इमारत से अलग करके देखना। 

टेबल न ८

डोर बँधी जब उससे, मैं खुद से दूर हो गया,

मैं ज़मीन पर हूँ, पर न जाने क्या है वो सातवें आसमान पे मेरा

मैं जहाँ डूबा था वहीं साहिल हो गया

पानी की तरह उतरा जब नशा मेरा। 

Glossary: वाइज़ – Preacher*, कामिल  – Expert*, काफिर  – Atheist*, मुगालता – Misunderstanding*, दोज़ख  – Hell

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