मयखाने में आलमी चर्चा : 2

इस मयखाने का ऩाटय-रूपान्तरण अपने पूरे आवेग 
मे मंच पर चला। पैरा-दर-पैरा बहकता ढंगसे साकी
की तरफ बढा।

वाइज चुप्प है तेरे मयखाने मे आकर,
क्योंकि वो जन्नत का जिक्र तभी करते है जब वे जन्नत मे नही होते।
साकी भी सुर का “स” और वर्णमाला का “क” लेकर,
किताबे जिन्दगी की  शुरुवात  उस सुकुन से करते 
है जिसमे लफ् नहीं होते ।
जंजीरो मे जकडे कैद से ज्यादा बोझ से मरते है,
ताकत ताकत से नही होती,और
कच्चे धागों से बन्धे रिश्ते कभी कमजोर नही होते।

  न नीद मेरी, न ख्याल न तू मेरा,
ये उम्मीद क्या शय है जो इम्तिहॉ ले रही है मेरा।
*न सिगरेट न शराब न फिराक मेरा,
रात भर नींद खून पीती रही मेरा।
न शाम डूबी,न रात डूबी कहॉ मै डूबा,
साहिल पर था पानी की तरह उतरा, जब नशा मेरा।

फूल के मुरझाने का सबब समझ आया
एक उम्र गुजर जाने के बाद,
उसने मुझे पहचाना,मयखाने मे
दवा लेने के बाद। 
ज्यादातर पछताए बहुत
दिवाने काे पत्थर मारने के बाद,
कुछ को तो खुदा भी मिला
पत्थर तराशने के बाद।

और अन्त मे, 
साकी(खुदा) की मेजबानी  अच्छी लगी,
जो आपे से बाहर थी वोही बात अच्छी लगी।
रुधंते गले ने रोका बहुत जन्मते सच को
जीभर के  अपनेपन मे जो दी गालियॉ, अच्छी लगी।

मैंने दीदार ये किया, जो पर्दा हटा तो,
देखा मयखाने मे वाइज जमीर बदलता है।
काफिर कहीं का वोे बुतपरस्त देखो,
खुदा के बदले मुझे पूजता है।

बुल्लेशाह फकीरॉ दियॉ गलॉं,
कोइ जोगी दे नाल नी जॉनदा।
जे तू मेरे नाल नाल, तॉं दिसदा क्यो नइ
तू  मिलया न मिल्ले बराेबर,तेतौं च़गां सरापा होइदॉ।

ए मजबूरियों, तुम लाख कोशिशे करो,
मैं अपने शौक की देखरेख मे हूं मै न बदलता।
ये साधौ किसी एक का, फिर चाहे वो पत्थर हो,
धर्म अगर दुविधा में हो तो तीर निशाने पर नही लगता।

वो हमे बताकर, हमको हमसे चुरा ले गया, 
ये वो चोरियां हैं जो कभी पकडी नही जाती।
जमाना अपनी जगह, शिकायते अपनी जगह, 
दस्तूर लिखता तो है पर जूनून मे सुनी नही जाती।

*शायर का नाम याद नही

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