उर्दू शायर मुनव्वर राणा ने लौटाया साहित्य अकादमी सम्मान

Munawwar Ranaaaa

मै मुनव्वरजी को बडे अदब से सुनता हूं। ईन्सानी रिश्तों को बारिकियों से बुनने के इकलौते शांयर है। मै अपने कुछ ख्याल रखना चाहता हूं:

“न शिकवा  न शिकायत, खम्बो पर लटके बिजली 
के तार, 
रेलगाडी की खिडकी  से ऊपर-नीचे होते 
छूटते जाते हैं किस पार,
पर किसी के घर मे रौशनी पहूंचाने
का माद्दा(दम) भी  वही रखते हैं मेरे यार”

मै तुझसे मुखातिब हूं, पर तेरे मुताबिक नही हूं,
जाऊंगा वहीं,जहॉ मेरे सच की लहर ले जाएगी।
अपने किनारो को बचा कर रखना ए सख्त साहिलों,
प्यास का क्या है, बाड सी बढी तो बिखर जाएगी।

कोई भी शायर ‘मूढ़’ नहीं,  हॉ ‘मूड’ का होता है।

“मुन्नवर” तेरे ‘इन’ रिश्तो की बारिकियॉ, कमजोर समझीं जाएगी।
जश्ने रेख्ता में,
ए घटाओं बाल सी लकीरो में अब खालें खिचवाईं जाएगी।
वो टुटे मिट्टी के बर्तन ‘टेराकोटा’ धरोहर है देश की,
क्योकि उनमे खडकने का डर  ही नही था  जो अावाज चली जाएगी।

हर शख्श अपने अन्दर एक चिंगारी दबाए बैठा है,
इससे पहले के राख हो जाएं, परमाणु से  कोई बिजली  बनाए बैठा है।

मै जानता हूं मेरी किस बात पर आग लग सकती है
नफरतो से बचना है, और कोई चुप्पी लगाए बैठा है।
क्या ऐसे हो सकता है कि सही बात पर गुस्सा आ जाए,
वो गलत बात पर आमादॉ है, पर लठ्ठ लिए बैठा है।

डर की परिभाषा मे मुझको सवाल बदलने की छूट है,
बाहरीे अन्धेरो से डरगया,घर  पर चरागो की दुकान किए बैठा है।

ये जो इस पार उस पार की खाई है वो पटेगी तो नहीं,
दोस्ती का जिक्र भी नादानी है, खॉमखॉ जी का जंजाल बनाए बैठा है।

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