भस्मासुर से पंचतन्त्र तक: लोकतन्त्र का एक सन्देश

बचपन मे एक कहानी पढी थी कि भस्मासुर ने लम्बी तपस्या के बाद शिवजी भगवान को प्रसन्न किया और ये वर प्राप्त किया कि वह जिसके भी सिर पर हाथ रख देगा वो भस्म हो जाएगा।
फिर एक दूसरी कहानी पढी कि एक भक्त राजा ने ये वर प्राप्त किया कि वो जिसको भी छूएगा वो सोना हो जाएगा। फिर एक दिन गल्ती  से उसने अपने  ही बच्चे  को  छू  लिया।  ये दुनिया शुरू से भौतिकता  (मटेरिअलिस्टिक) के प्रति  आकृष्ट रही है।
गीता में कहा कि कर्म कर,फल की चिन्ता मतकर।
जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, जो होगा वह भी अच्छा ही होगा।

पर आजतक न किसी धर्म गूरू ने खुद,न ही अपने किसी शिष्य को इस ओर अग्रसर किया या प्रेरणा ही दी कि वो तपस्या करके ये वर मॉगे कि वो जिसको भी हाथ लगाए वो आदमी से एक अच्छा इन्सान हो जाए।सर पर हाथ रखकर आशिर्वाद देने की हमारे
यहॉ जो प्रथा है वो  जाने अनजाने शायद इस ओर  एक कदम हो।
शायद ये सन्देह रहा होगा कि ये धर्म की दुकाने कही बन्द न हो  जाएं।

अपना अस्तित्व बचाने के लिए कोई भी यत्न   जायज है। एक बच्चे की किताब मे दिवारो के ढॉचे
को दिखाकर यह पढाया जाता है कि ये मन्दिर है ये मस्जिद है ये चर्च है ये गुरूद्वारा है। फिर शुरू होती है धर्म की पहचान। फिर बच्चा जो जिज्ञासु है आगे-२ चलकर पूछता है टोपी क्या होती है बुर्का क्या होता है, हैट या पगडी क्या होती है?
सारा  खेल टोपी पहनाने और उछालने का है। अब यह एक मुहावरा है टोपी उछालना या पगडी उछालना। बात उछालनी है तो हो सकता है मिडिया ये बात उछाल दे कि आपने टोपी या पगडी उछालना ही क्यो कहा। क्या आप एक धर्म विशेष के विरूद्ध हैं आपने क्यो नही हैट उछालने की बात कही। अब कैसे समझाउं मैसेज गल्त जाता है। यह उनके लिए खुशी की बात है। एक बच्चे ने  बताया जब वह खुशी मे होते है तो हैट उछालते है।
कुल मिलाकर अब  जब सर बचाने से मतलब है  तो सर ढकने के मायने समझने से क्या फायदा है। अब एक नही कई भस्मासुर है । उस जमाने के भस्मासुर  मे लाइफ इन्शुरन्स वाला ‘बीमा हित’ मौजूद था और उसे धोखे से मारा गया था। आजका भस्मासुर तो छाती मे बम लिये घूम रहा है। और वो अगर दस साल का बच्चा हो तो क्या किजीएगा।

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