मुझे उसने नज़र भर के देखा………

मुझे उसने नज़र भर के देखा,
बस इतना ही काफी था,
बोल के जताया तो क्या जताया,
मज़ा किरकिरा हो गया।
जबॉ पर आयी बात, जूठी हो गयी,
ऑखों ही ऑखो मे जाने क्या हुआ
दिल एका हो गया।

प्यार भी करते हो और शब्द खोजत हो
अभिव्यक्ति का ये कैसा फलसफा है।
मैं उदास हूं और उसका खत आया है
न जाने कैसे खबर से पहले उसको पता हो गया
है।

सोचा था मॉझी से करेंगें शिकायत,
अब सुना है लहरों का कश्ती से समझौता हो गया है।
मैं हवा में हूं; डूबने कहॉ देती है शराब,
ये शरीर पानी से हल्का हो गया।

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Intolrance is infectiouse disease or A way of life

असहनशीलता एक संक्रामक रोग है या जीने का तरीका
असहनशीलता एक संक्रामक रोग है या जीने का तरीका,
मरहम मॉग रहा है दर्द को,जरूरत के हिसाब से।

पहले तो हम सिर्फ पढ़ते थे, अब वो सुर्खियों मे है,

जो अखबार भारी हो, वजन में रद्दी के हिसाब से।

कोई भी सवाल करो, और उत्तर  हॉ या न मे हो,
बॉट देते हैं बहस मे देश को,चैनल अपने हिसाब से।

अब झगडा इस बात पर है सौ जूते पडे किस हिसाब से,
सजा याफता चाहता है, खड़ॉव नहीं पड़े चप्पले
कोहलापुरी से।

न जाने एसा क्या हो गया है बर्दाश्त नही होता,
तराजू वजन तोलता है, कॉटा हवा के दवाब से।

Ek gaon ki kahani

    एक गांव की सच्ची कहानी

यह कहानी एक गॉव की ही नही हमारी तुम्हारी, पूरे देश की कहानी है। दरअसल मेरा हिमाचल के एक गॉव मे जाना हुआ। जिनके  पास रूका था उनका
एक स्कूल चलता है। और कहानी उसी स्कूल की स्थापना को लेकर है। उन्होने बताया काफी ज़दोजहद करनी पडी थी इस विद्यालय को स्थापित करने मे। उनका नाम शशांक है।
उन्होने बताया कि जमीन खरीदने के बाद वो सम्बन्धितदफ्तर मे परमिशन लेने गये। पता लगा दर दर की ठोकरे खानी पडेगी। इतनी फोर्मलिटीज़ कि पूरी करने मे उम्र निकल जाएगी पर लाल फीते की लम्बाई कम न होगी। इसी सघंर्ष के दौरान
एक अनुभवी व्यक्ति से चाय की दुकान पर भेंट
हुई बोले “उलझ जाओगे मै तुम्हे जैसे जैसे बताऊं वैसे वैसे करते जाना। वैसे मेरा नाम प्रशान्त है। मुझसे आप आज के बाद सिर्फ फोन पर या गॉव से बाहर बात करना। सस्पेंस है बाद में बताऊंगा”।
मुझे वो प्रशान्त कुछ दिलचस्प लगा। बिल्कुल
ऐसे ही जैसे आगे चलकर आप को लगने लगेगा।

प्रशान्त बोले  :  कुछ सूत्र हैं उन्ही के हिसाब से कार्यक्रम बनाईएगा।
पहला – इमारत बनाने की अभी मत सोचिए।
कल एक पूजा रखिए कुछ बडे लोगों को बुलाइये और एक ईंट गाड़कर शिलान्यास कर दीजिए।
इसके बाद दो दिन मे आपको न्यूज मिल जाएगी। और प्रशान्त वहॉ से चले गये।
कोई ज्यादा बडा़ खर्चा भी नहीं था। मैने वैसा ही किया। शिलान्यास हो गया। गॉव के पटवारी, सरपंच और कुछ बुज़ुर्गवारों ने हिस्सा लिया।
और अभी सप्ताह भी न गुज़रा था न्यूज़ आने
लगी। नार्थ, ईस्ट, वैस्ट और साऊथ के जो पडौसी थे उनकी तरफ से कचहरी से नोटिस था। किसी ने एन्क्रोचमेंट का दावा किया तो किसी ने कहा कृषि भूमि है। इसका कुछ हिस्सा बच्चों के खेलने का मैदान है वगैरह वगैरह। दृश्य कुछ कुछ साफ होने लगा। प्रशान्त से फोन पर बात हुई। वो बोले पटवारी से मिलो। वही अच्छे आदमी है। सारे एनओसी वही

दिलवाएगे।
खैर मै जाकर उनसे मिला। और हल भी उन्होने निकाला। जितने भी दावेदार थे सबको प्यार से समझाया कि सामाजिक कार्य है गॉव के बच्चों का उद्धार, गॉव का विकास है। जो मान गये वो ठीक जो न माने उनकी ज़मीन पटवारी ने सुबह ही नपवानी शुरु की और हरेक की ज़मीन मे कुछ न कुछ कमी निकाल दी। फिर क्या था, सारे केस वापिस हो गये।
अब सरपंच जी को लगा की उनकी अनदेखी हुई है वो अड़ गये।
प्रशांत जी से बात हुई बोले तुम शान्ति से काम लेना बाकी मुझपर छोड़ दो। हॉ कल सरपंचजी को दस बजे ये खबर पहुंचा देना कि विपक्ष वाले स्कूल के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं।
सुबह देखा तो वही प्रशान्त प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे हैं। और सरपंच और पटवारी की हाय-हाय हो रही है। प्रशान्त और सरपंच मे तो हाथापाई की नौबत आ गई। मुझे समझ नही आ रहा था कि प्रशान्त कही मुझे किसी राजनीति का मौहरा तो नहीं बना रहा। खैर प्रदर्शनकारी चले गये। पर सरपंच जी मेरे पास आए और कंन्धे पर हाथ रखकर बोले “आप इस साले प्रशान्त से कतइ मत डरिये। मै देखता हूं ये स्कूल बनाने से कौन आपको रोकता है।”
प्रशान्त हल्के से कान में फुसफसाए “काम हो गया”।और यह कहकर चलते बने ‘स्कूल का काम  शुरू कर दो’। मुझे अब सारा दृश्य समझ आ गया था।
रात मे मै प्रशान्त जी से खुद मिलने गया। उन्हाेने कहा – डेमोक्रेसी हो फासिस्टवाद हो या कम्युनिज्म हो या पूंजीवाद  हरेक  ‘इज़्म’ का एक सिस्टम है अगर आप कमजोर हैं तो आपको ये तो सीखना ही पडेगा कि उसकी ताकत आपकी ताकत कैसे बने। जूडो जापानी तकनीक इसका बहुत सुन्दर उदाहरण है। फिर प्रशान्त जी बोले “अभी एक दो फोन आपको आएगे मना मत किजीएगा। इसे बिल्कुल एसे समझिए जैसे
रावण जब मृत्यु शैया पर लेटे थे तो  भगवान राम ने लक्षमण को कहा कि जाओ दीक्षा लो क्योकि रावण महाज्ञानी है।और शिक्षा  सरपर खडे होकर नहीं पैरों में, बैठकर  ली  जाती  है। और हंस कर चल दिए।संवाद संकेत-आत्मक था।
कुछ दिन बाद प्रशांत के कहे अनुसार मुझे पहला फोन पटवारी का आया। बोले एक गुजारिश है
इतना तो आप कर ही सकते हैं। मेरी बिटिया ने बीएड किया है बस उसको मास्टरनी बना दीजिए। हर्ज भी क्या था मै बोला-रख लेंगे सर।
दूसरा फोन सरपंच जी का आया। बोले सर इतना काम किया है हमे कुछ नही चाहिए पैसे की हमारे पास कोई कमी नही है। बस हम चाहते है कि स्कूल का नाम हमारे दादा जी पर रख देगे तो आपकी कृपा होगी।.
………यह कहानी लगभग  सन २००० की है।
अगर इस कहानी को बिहार के चुनाव से जोडकर देखे तो ऐसा नही लगता कि कहानी दौहरायी जा रही है। इसमे प्रशान्त वही प्रशान्त किशोर नही लगते जिन्होने बिहार इलेक्शन मे नितीश कुमार के सर पर  जीत का सेहरा बांधने की अहम भूमिका निभायी। शशांक  जैसे नितीश की भूमिका मे नज़र आते हैं।

(Democracy has the power to absorb man(y) ‘ism)

क्या दहशतगर्दी सहनशीलता सिखा सकती है

क्या दहशतगर्दी सहनशीलता सिखा सकती है?
कहीं ‘चुप कराना’ चुप रहने का कारण न निकले

इनटॉलेरेंस पर मेरे जज़्बात बहुत निकले फिर भी कम निकले,
घरों से लोग जब दहशत में निकले, दिल मे अफसोसhttps://rakeshkumardogra.wordpress.com Continue reading

दीपावली पर गिफ्ट

     दीपावली पर गिफट

इस दिवाली गिफ्ट दो, सौ रू का ही सही,
हो दाल चाहे आधा किलो, पर हो दाल अरहर की,
दाल में कुछ काला न हो,
पर दाल पीली बननी चाहिए।
 
कुछ तो भाव कम हुआ है
चाहें  प्याज  के दो फूल ही सही,
पर तड़का प्याज का लगना चाहिए।

दिवारों पर टंगे है,बचे पुरूस्कार ही सही
जो काम आ गये उन्हे जीत की खुशी मे,
श्रध्दांजलि मिलनी चाहिए।

इस दिवाली ‘होम’ हुए
जब अाग में तुमने घी डाला
हमने कहा ” हवन होना चाहिए”
तुम जीते मैं शुद्ध हुआ
गिरकर उठें सब मिलजुल कर
ऐसा भान होना चाहिए।

घी के दिए किताबों में
ज्वलनशील घोषित होने चाहिए
अजीब जंग है आप की,
थाने मे पुलिस आपकी
पर सडक पर
सरकार मेरी होनी चाहिए।

इन्टॉलरेंस की अमर बेल

एेसा नही है कि असहनशीलता नज़र मे नही थी लेकिन इस विषय पर आजकल ध्यान और चर्चा दोनो ही जोर पर है। ये अचानक है ऐसा भी नही है। इसके पीछे एक ही कारण है “असुरक्षा’।  सवाल है किसको किससे।  ये सब जो घर से निकलकर सडक पर आ गये है तब कहां होते हैं जब कुछ लोग मेरे ही देश में रहते है खाते है और सामने  सामने भारत का झण्डा जला देते है।जुलुसों मे पडोसी देश का झण्डा फहराते है।

कोई कुछ नही कहता तो क्या इसे सहनशीलता कहते है ? ये सोच असहनशीलता की केटेगरी में  आती  है। भीड़ से ये आक्कलन करना कि मरनेवालाे मे कौन शहीद है और कौन उग्रवादी ये वैचारिक नपुंसकता है। आदर्श की बात पर बहस करनी है तो माफ करना देश पहले है। कुंभ के मेले में भी जब लूट करनी होती है तो इतने  श्रध्दालुओं मे वो पांच सात लोग कामयाब हो जाते हैं जो  यह हवा उडा देते है  पैरो में सॉप है सॉप है।और फिर “भगदड” नतीजा लूट।

एक दिन जंगल से शेर रास्ता भूलकर शहर में आ गया। उसकी एक झलक दिखी और वो कही छिप गया। अब शहर मे,भय के कारण,  कही भी कोई घटना घटे, नाम शेर का लगे। ये लूट वाले यहॉ भी हैं। हाथ  धो लीजिए हिंसा की बात हो रही है।कोई भी विषय उठा लीजिए, उसमे स्पर्धा, जूूनून  या नफरत का पुट ज़रूर होना चाहिए।  खेल खेल मे किसी ने कह दिया अपनी ‘एशेज’ ले जाइए। बस राख मे ऐसी चिन्गारी गिरी के ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड मे ये श्रंखला अनवरत रूप से  आज भी “एशेस” के नाम  से चालू है। खेल के मैदान पर  होते हैं पर जैसे जंग हो रही हो। इसको और ऊपर के स्तर पर देखना है तो भारत और पाकिस्तान के किसी भी खेल को किसी भी फॉर्मेट पर देख लीजिए। यह खेल इतना जू़नूनी क्यो है। क्योकि इसमे  दर्शक देश प्रेम नही धार्मिक हो जाता है और सीमा लॉघ जाता है। “धर्म निरपेक्ष” अमूल्य धारणा है सोच है। पर यहां मै अपने विचार तो ऱख ही सकता हूं। ये  मेरा मौलिक अधिकार है। राष्टृहित मे कोई भी बात हो वो धर्म से ऊपर होनी चाहिए।&nbsइसका एक उदाहरण है चीन ” एक दम्पति एक ही बच्चा” रख सकता है। नियम  है। क्या भारत मे ऐसा हो सकता ? यहां तरक्की व समृद्धि के आड़े कोई चीज़ अगर आ रही है तो वो जनसंख्या है। पर ये कब तक चलेगा कि कोई कानून एक  धर्म  पर लागू दूसरे पर नही। “नंबर गेम” इसकी जड़ में है। “अमर-बेल” की तरह फैल रहा है।

“अमर बेल के बारे मे अगर आपको जानकारी नही है तो बता दूं ये वो बेल है जिसकी जड़ नही होती। जिस पेड पर लगती है जब तक वो पेड है वो जिन्दा है। इसलिए वो अमर है। ” एक कहावत है अन्यथा न ले  – जब रजाई खटमल हों तो क्या रजाई फूंक देनी चाहिए।

इस देश मे जितना चिन्तन  ध्यान, योग, सयंम दया और दान पर है मै दावे के साथ कह सकता हूं पूरे संसार मे इसका कोई दूसरा सामी नही हो सकता। इस सबके अलावा बोलने की स्वतन्त्रता। कई देशों में तो सर कलम कर दिये जाते हैं अगर कोई जारी फर्मान के विरोध मे एक शब्द भी मुंह से निकाले तो।  सय्यंम शब्द शायद सहने वाले के लिए बना है।

क्योकि अगर दूसरा भी संयमी है तो झगडा खत्म। एक किस्सा है। एक बार एक आदमी को यह वहम् हो गया कि वो बाजरे का दाना है और किसी भी पक्षी ने देखा तो वो उसे खा जाएगा। खैर बहूत ईलाज किया और उसे यह विश्वास दिलाया कि वो इन्सान है बाजरे का दाना नही।और हॉस्पिटल से छुट्टी दे दी गई।  उसे अभी बाहर निकले उसे दस मिनट भी नही हुए थे कि उसे बाहर एक आदमी मिला जो सिर्फ ये बताने के लिए खड़ा है कि तू तो ठीक हो गया पर उस चिड़िया को तो नहीं पता।और उसका सिर्फ यही काम भी है शौकिया है या तो वो सोया रहता है जागता है तो बस यही काम नहीं तो उवासी लेता रहता है इस तरह के उवासी लेने वाले लोग हर धर्म हर तबके में मिलेंगे। तो ये सुनकर वो वापिस लौट आया। डा़क्टर ने पूछा अब क्या हुआ। मरीज बोला कि डा़क्टर साहिब मुझे तो पता है  पर  जो बाहर  पेड  पर बैठी  चिडिया मुझे घूर रही है उसे कौन समझाएगा कि मै बाजरे का दाना नहीं इन्सान हूं।

“अन्धेरे का एक ही रंग है, मैलखोरा सा,

सूरज भी फासले से गुजरा अन्धेरा मिटाकर।

कोयला हो या बन्द ऑखो के केन्द्र मे रौशनी,

हीरा जन्म अनमोल होगा रंन्जिशे मिटाकर।”

अगर  असहनशीलता की गहन चर्चा की जाए तो सियासत सन् सत्तावन से शुरू हो जाएगी। सन चौरासी मे दंगे  हूए बहुत गल्त हुआ। सन २००२ मे गुजरात मे दंगे हुए गल्त हुआ। पर कश्मीर मे जो हुआ वो एक गहन अध्ययन का विषय है। इसमे लगभग आज एक भी कश्मीरी पंडित वहा नही है । क्यो? अब अगर कश्मीर मे विभिन्न समुदाय नही है तो क्या वहा सहनशीलता है नही है। बल्कि स्थिती ज्यादा नाजुक है। अब इंटॉलरेंस यहॉ सर उठा सकती है कि यह लेखक किसी वर्ग विशेस का एजेन्ट तो नहीं । कश्मीरियो की बात करता है और सिक्खों की या गोधरा की नहीं।  यहॉ सबसे बड़ी बिमारी है और मीडिया इसको बखूबी जानता है कि टीआरपी बडानी है तो religion और communalism को मिक्स कर दो। जबकि दोनो कतई एक नही है। 

बस एक बात पकडी  और  बहस  शुरू।तो सभी समुदायों से बिनती है कि आरोप प्रत्यारोप बन्द करके निदान पर कार्य करे। सुझाव दे,लोग सभी अच्छे हैं। सियासत ठीक नही है। सियासत हमेशा बिल्कुल उस बन्दर का सा काम करती  है जो दो बिल्लीयों को लडवाकर पूरा माल हडपना चाहती है। अपने कुछ हित त्यागें तभी कुछ हो सकता है। पडौसी मुल्क का साया भी आग में घी डालने का काम करता है। उसका अपना कुछ भी ठीक नही है। कुछ मुटठीभर अलगाव वादी लोग हैं, जो पडौसी देश का नारा  लगाते हैं। उनका  झंडा  फैराते  है  और चाहते हैं  कि  फूट  पड़े। 

अ त:  दोस्तो आरोप नही सिर्फ सुझाव पर अमल करे। नही तो ज्यादातर टीवी चैनलो की तरह सारा प्रोग्राम बहस मे खत्म “पंचो की राय सरमाथे पर पतनाला वही गिरेगा”।

मन्दिर हो या मस्जिद दोनो को श्रध्दा से देखना,

पूजा-ईबाबत को ईमारत से अलग करके देखना।

मै जहॉ डूबा था उसी साहिल पे मिलूंगा,

पानी की तरह उतरेगा जब मेरा ये  नशा देखना।

मैं टूटा हुआ नही हूं, ज़रा गौर से देखना,

मुझको अपने आईने से अलग करके देखना।

भड़काउ भाषणों पर नियन्त्रण नही रहा। अब अगर भड़काऊ भाषण देनेवालों पर नियन्त्रण नही होगा तो स्थिती गम्भीर होती जाएगी। अब ये स्थिती बिल्कुल ” भंवर या बहते हुए लावे” की सी है। इस सैलाब में सहनशीलता कही किसी साजिश मे  होम  न हो जाए। बहुत नाजुक मामला है। जितने भी शिक्षाविद  हैं या यू  कहे कि जिनकी आवाज सुनी जाती है सभी लहर मे तैरते तो दिखते हैं बस डर है कि कहीं बह न जांएं।

यह लेख सिर्फ और सिर्फ इस मंशा से लिखा है कि किसी तरह से इस देश  में सन्तुलन बना रहे।

   “तरक्की तो मेरे कदमो में है

कुछ बेड़ियॉ है जो चलने नही देती।”

कहीं “धर्म-निरपेक्ष” देश धर्म के आडे़ तो नहीं आ  रहा है।

अब अच्छे बुरे लोग हर सरकार हर तबके मे मिलेगें। इस सरकार मे भी हैं। पहले जो सरकारे आई उसमे भी थे। कहानी मे राम और रावण दोनो होते है। तभी तो सत्य चरितार्थ होता है। इसको कौन से “युग” की शक्ल देनी है आप के हाथ मे है।

बस यह कहकर अन्त करता हूं कि यह इंटॉलरेंस का जो लावा फूटा है यह बिल्कुल दुसरे लावे की तरह है इसको बहने की जगह चाहिए क्योकि ये फट चुका है इसको रोकने की कोशिश मे अगर आपने कोई बाड़ या बॉध भी लगाया तो इसकी आग उसे भी अपनी शक्ति मे बदल लेगा।