ये कौन सी हवा है……क्या रखा है पुरूस्कारों में

दिलों के फासले जब सार्वजनिक होने लगें,
गठजोड़ कैसे करना है,सीखिए सत्ता के गलियारों में।
२०० रू किलो दाल, और दस रू में थाली,
सत्ता बेच रही है सपने, संसद के गलियारों में।
मुद्दा कोई भी हो, इस अखण्ड भारत में,
भटक गया हू मै, मुण्डे-२ मति भिन्ना के सैलाबो में।
ये कैसी योजना बना रहा है प्लानिंग का कमीशन,
प्लान गया तेल लेने, कमीशन कूए-अंधियारे में।

एक वो हवा थी जिसका रूख कलम बदल देती थी,
ये कौन सी हवा है जो कह रही है क्या रखा है पुरूस्कारों में।
प्रोत्साहन पढे लिखों ने त्यागा,उग्र प्रलोभन कर दिया,
अब के बच्चों के हाथों में, कौन सा बम फटे त्यौहारो में।
अंधकार में कही दीप जले तो  कुछ रौशन हो,
प्रकाश हुआ कुछ उजला हो, न आग लगे मशालों में।

किसी रौशनी से,
अन्धेरा आहत हुआ हो, एसा भी नहीं है।
अहिंसा की आगोश बडी़ है,  परन्तु
भेडिया भूखा न भी हो,
कहॉ चूकता है शिकार करने में।
ये जानते हुए भी कि रेगिस्तान है
‘सरापा’ जगह जगह अपना पानी छोड़ देता है।
सब रंग समाहित इस सफेद में दूध की माफिक,
और कितना खून बहेगा इस दूध का पानी होने में
(“सरापा”- मृग-तृष्णा, मिराज़)
कुछ बर्दाश्त न भी हो, कलम हाथ से मत छोडना,
सहनशीलता बदमजा़ हो गई, सौगातें लौटाने में।

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