इन्टॉलरेंस की अमर बेल

एेसा नही है कि असहनशीलता नज़र मे नही थी लेकिन इस विषय पर आजकल ध्यान और चर्चा दोनो ही जोर पर है। ये अचानक है ऐसा भी नही है। इसके पीछे एक ही कारण है “असुरक्षा’।  सवाल है किसको किससे।  ये सब जो घर से निकलकर सडक पर आ गये है तब कहां होते हैं जब कुछ लोग मेरे ही देश में रहते है खाते है और सामने  सामने भारत का झण्डा जला देते है।जुलुसों मे पडोसी देश का झण्डा फहराते है।

कोई कुछ नही कहता तो क्या इसे सहनशीलता कहते है ? ये सोच असहनशीलता की केटेगरी में  आती  है। भीड़ से ये आक्कलन करना कि मरनेवालाे मे कौन शहीद है और कौन उग्रवादी ये वैचारिक नपुंसकता है। आदर्श की बात पर बहस करनी है तो माफ करना देश पहले है। कुंभ के मेले में भी जब लूट करनी होती है तो इतने  श्रध्दालुओं मे वो पांच सात लोग कामयाब हो जाते हैं जो  यह हवा उडा देते है  पैरो में सॉप है सॉप है।और फिर “भगदड” नतीजा लूट।

एक दिन जंगल से शेर रास्ता भूलकर शहर में आ गया। उसकी एक झलक दिखी और वो कही छिप गया। अब शहर मे,भय के कारण,  कही भी कोई घटना घटे, नाम शेर का लगे। ये लूट वाले यहॉ भी हैं। हाथ  धो लीजिए हिंसा की बात हो रही है।कोई भी विषय उठा लीजिए, उसमे स्पर्धा, जूूनून  या नफरत का पुट ज़रूर होना चाहिए।  खेल खेल मे किसी ने कह दिया अपनी ‘एशेज’ ले जाइए। बस राख मे ऐसी चिन्गारी गिरी के ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड मे ये श्रंखला अनवरत रूप से  आज भी “एशेस” के नाम  से चालू है। खेल के मैदान पर  होते हैं पर जैसे जंग हो रही हो। इसको और ऊपर के स्तर पर देखना है तो भारत और पाकिस्तान के किसी भी खेल को किसी भी फॉर्मेट पर देख लीजिए। यह खेल इतना जू़नूनी क्यो है। क्योकि इसमे  दर्शक देश प्रेम नही धार्मिक हो जाता है और सीमा लॉघ जाता है। “धर्म निरपेक्ष” अमूल्य धारणा है सोच है। पर यहां मै अपने विचार तो ऱख ही सकता हूं। ये  मेरा मौलिक अधिकार है। राष्टृहित मे कोई भी बात हो वो धर्म से ऊपर होनी चाहिए।&nbsइसका एक उदाहरण है चीन ” एक दम्पति एक ही बच्चा” रख सकता है। नियम  है। क्या भारत मे ऐसा हो सकता ? यहां तरक्की व समृद्धि के आड़े कोई चीज़ अगर आ रही है तो वो जनसंख्या है। पर ये कब तक चलेगा कि कोई कानून एक  धर्म  पर लागू दूसरे पर नही। “नंबर गेम” इसकी जड़ में है। “अमर-बेल” की तरह फैल रहा है।

“अमर बेल के बारे मे अगर आपको जानकारी नही है तो बता दूं ये वो बेल है जिसकी जड़ नही होती। जिस पेड पर लगती है जब तक वो पेड है वो जिन्दा है। इसलिए वो अमर है। ” एक कहावत है अन्यथा न ले  – जब रजाई खटमल हों तो क्या रजाई फूंक देनी चाहिए।

इस देश मे जितना चिन्तन  ध्यान, योग, सयंम दया और दान पर है मै दावे के साथ कह सकता हूं पूरे संसार मे इसका कोई दूसरा सामी नही हो सकता। इस सबके अलावा बोलने की स्वतन्त्रता। कई देशों में तो सर कलम कर दिये जाते हैं अगर कोई जारी फर्मान के विरोध मे एक शब्द भी मुंह से निकाले तो।  सय्यंम शब्द शायद सहने वाले के लिए बना है।

क्योकि अगर दूसरा भी संयमी है तो झगडा खत्म। एक किस्सा है। एक बार एक आदमी को यह वहम् हो गया कि वो बाजरे का दाना है और किसी भी पक्षी ने देखा तो वो उसे खा जाएगा। खैर बहूत ईलाज किया और उसे यह विश्वास दिलाया कि वो इन्सान है बाजरे का दाना नही।और हॉस्पिटल से छुट्टी दे दी गई।  उसे अभी बाहर निकले उसे दस मिनट भी नही हुए थे कि उसे बाहर एक आदमी मिला जो सिर्फ ये बताने के लिए खड़ा है कि तू तो ठीक हो गया पर उस चिड़िया को तो नहीं पता।और उसका सिर्फ यही काम भी है शौकिया है या तो वो सोया रहता है जागता है तो बस यही काम नहीं तो उवासी लेता रहता है इस तरह के उवासी लेने वाले लोग हर धर्म हर तबके में मिलेंगे। तो ये सुनकर वो वापिस लौट आया। डा़क्टर ने पूछा अब क्या हुआ। मरीज बोला कि डा़क्टर साहिब मुझे तो पता है  पर  जो बाहर  पेड  पर बैठी  चिडिया मुझे घूर रही है उसे कौन समझाएगा कि मै बाजरे का दाना नहीं इन्सान हूं।

“अन्धेरे का एक ही रंग है, मैलखोरा सा,

सूरज भी फासले से गुजरा अन्धेरा मिटाकर।

कोयला हो या बन्द ऑखो के केन्द्र मे रौशनी,

हीरा जन्म अनमोल होगा रंन्जिशे मिटाकर।”

अगर  असहनशीलता की गहन चर्चा की जाए तो सियासत सन् सत्तावन से शुरू हो जाएगी। सन चौरासी मे दंगे  हूए बहुत गल्त हुआ। सन २००२ मे गुजरात मे दंगे हुए गल्त हुआ। पर कश्मीर मे जो हुआ वो एक गहन अध्ययन का विषय है। इसमे लगभग आज एक भी कश्मीरी पंडित वहा नही है । क्यो? अब अगर कश्मीर मे विभिन्न समुदाय नही है तो क्या वहा सहनशीलता है नही है। बल्कि स्थिती ज्यादा नाजुक है। अब इंटॉलरेंस यहॉ सर उठा सकती है कि यह लेखक किसी वर्ग विशेस का एजेन्ट तो नहीं । कश्मीरियो की बात करता है और सिक्खों की या गोधरा की नहीं।  यहॉ सबसे बड़ी बिमारी है और मीडिया इसको बखूबी जानता है कि टीआरपी बडानी है तो religion और communalism को मिक्स कर दो। जबकि दोनो कतई एक नही है। 

बस एक बात पकडी  और  बहस  शुरू।तो सभी समुदायों से बिनती है कि आरोप प्रत्यारोप बन्द करके निदान पर कार्य करे। सुझाव दे,लोग सभी अच्छे हैं। सियासत ठीक नही है। सियासत हमेशा बिल्कुल उस बन्दर का सा काम करती  है जो दो बिल्लीयों को लडवाकर पूरा माल हडपना चाहती है। अपने कुछ हित त्यागें तभी कुछ हो सकता है। पडौसी मुल्क का साया भी आग में घी डालने का काम करता है। उसका अपना कुछ भी ठीक नही है। कुछ मुटठीभर अलगाव वादी लोग हैं, जो पडौसी देश का नारा  लगाते हैं। उनका  झंडा  फैराते  है  और चाहते हैं  कि  फूट  पड़े। 

अ त:  दोस्तो आरोप नही सिर्फ सुझाव पर अमल करे। नही तो ज्यादातर टीवी चैनलो की तरह सारा प्रोग्राम बहस मे खत्म “पंचो की राय सरमाथे पर पतनाला वही गिरेगा”।

मन्दिर हो या मस्जिद दोनो को श्रध्दा से देखना,

पूजा-ईबाबत को ईमारत से अलग करके देखना।

मै जहॉ डूबा था उसी साहिल पे मिलूंगा,

पानी की तरह उतरेगा जब मेरा ये  नशा देखना।

मैं टूटा हुआ नही हूं, ज़रा गौर से देखना,

मुझको अपने आईने से अलग करके देखना।

भड़काउ भाषणों पर नियन्त्रण नही रहा। अब अगर भड़काऊ भाषण देनेवालों पर नियन्त्रण नही होगा तो स्थिती गम्भीर होती जाएगी। अब ये स्थिती बिल्कुल ” भंवर या बहते हुए लावे” की सी है। इस सैलाब में सहनशीलता कही किसी साजिश मे  होम  न हो जाए। बहुत नाजुक मामला है। जितने भी शिक्षाविद  हैं या यू  कहे कि जिनकी आवाज सुनी जाती है सभी लहर मे तैरते तो दिखते हैं बस डर है कि कहीं बह न जांएं।

यह लेख सिर्फ और सिर्फ इस मंशा से लिखा है कि किसी तरह से इस देश  में सन्तुलन बना रहे।

   “तरक्की तो मेरे कदमो में है

कुछ बेड़ियॉ है जो चलने नही देती।”

कहीं “धर्म-निरपेक्ष” देश धर्म के आडे़ तो नहीं आ  रहा है।

अब अच्छे बुरे लोग हर सरकार हर तबके मे मिलेगें। इस सरकार मे भी हैं। पहले जो सरकारे आई उसमे भी थे। कहानी मे राम और रावण दोनो होते है। तभी तो सत्य चरितार्थ होता है। इसको कौन से “युग” की शक्ल देनी है आप के हाथ मे है।

बस यह कहकर अन्त करता हूं कि यह इंटॉलरेंस का जो लावा फूटा है यह बिल्कुल दुसरे लावे की तरह है इसको बहने की जगह चाहिए क्योकि ये फट चुका है इसको रोकने की कोशिश मे अगर आपने कोई बाड़ या बॉध भी लगाया तो इसकी आग उसे भी अपनी शक्ति मे बदल लेगा।

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