Ek gaon ki kahani

    एक गांव की सच्ची कहानी

यह कहानी एक गॉव की ही नही हमारी तुम्हारी, पूरे देश की कहानी है। दरअसल मेरा हिमाचल के एक गॉव मे जाना हुआ। जिनके  पास रूका था उनका
एक स्कूल चलता है। और कहानी उसी स्कूल की स्थापना को लेकर है। उन्होने बताया काफी ज़दोजहद करनी पडी थी इस विद्यालय को स्थापित करने मे। उनका नाम शशांक है।
उन्होने बताया कि जमीन खरीदने के बाद वो सम्बन्धितदफ्तर मे परमिशन लेने गये। पता लगा दर दर की ठोकरे खानी पडेगी। इतनी फोर्मलिटीज़ कि पूरी करने मे उम्र निकल जाएगी पर लाल फीते की लम्बाई कम न होगी। इसी सघंर्ष के दौरान
एक अनुभवी व्यक्ति से चाय की दुकान पर भेंट
हुई बोले “उलझ जाओगे मै तुम्हे जैसे जैसे बताऊं वैसे वैसे करते जाना। वैसे मेरा नाम प्रशान्त है। मुझसे आप आज के बाद सिर्फ फोन पर या गॉव से बाहर बात करना। सस्पेंस है बाद में बताऊंगा”।
मुझे वो प्रशान्त कुछ दिलचस्प लगा। बिल्कुल
ऐसे ही जैसे आगे चलकर आप को लगने लगेगा।

प्रशान्त बोले  :  कुछ सूत्र हैं उन्ही के हिसाब से कार्यक्रम बनाईएगा।
पहला – इमारत बनाने की अभी मत सोचिए।
कल एक पूजा रखिए कुछ बडे लोगों को बुलाइये और एक ईंट गाड़कर शिलान्यास कर दीजिए।
इसके बाद दो दिन मे आपको न्यूज मिल जाएगी। और प्रशान्त वहॉ से चले गये।
कोई ज्यादा बडा़ खर्चा भी नहीं था। मैने वैसा ही किया। शिलान्यास हो गया। गॉव के पटवारी, सरपंच और कुछ बुज़ुर्गवारों ने हिस्सा लिया।
और अभी सप्ताह भी न गुज़रा था न्यूज़ आने
लगी। नार्थ, ईस्ट, वैस्ट और साऊथ के जो पडौसी थे उनकी तरफ से कचहरी से नोटिस था। किसी ने एन्क्रोचमेंट का दावा किया तो किसी ने कहा कृषि भूमि है। इसका कुछ हिस्सा बच्चों के खेलने का मैदान है वगैरह वगैरह। दृश्य कुछ कुछ साफ होने लगा। प्रशान्त से फोन पर बात हुई। वो बोले पटवारी से मिलो। वही अच्छे आदमी है। सारे एनओसी वही

दिलवाएगे।
खैर मै जाकर उनसे मिला। और हल भी उन्होने निकाला। जितने भी दावेदार थे सबको प्यार से समझाया कि सामाजिक कार्य है गॉव के बच्चों का उद्धार, गॉव का विकास है। जो मान गये वो ठीक जो न माने उनकी ज़मीन पटवारी ने सुबह ही नपवानी शुरु की और हरेक की ज़मीन मे कुछ न कुछ कमी निकाल दी। फिर क्या था, सारे केस वापिस हो गये।
अब सरपंच जी को लगा की उनकी अनदेखी हुई है वो अड़ गये।
प्रशांत जी से बात हुई बोले तुम शान्ति से काम लेना बाकी मुझपर छोड़ दो। हॉ कल सरपंचजी को दस बजे ये खबर पहुंचा देना कि विपक्ष वाले स्कूल के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं।
सुबह देखा तो वही प्रशान्त प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे हैं। और सरपंच और पटवारी की हाय-हाय हो रही है। प्रशान्त और सरपंच मे तो हाथापाई की नौबत आ गई। मुझे समझ नही आ रहा था कि प्रशान्त कही मुझे किसी राजनीति का मौहरा तो नहीं बना रहा। खैर प्रदर्शनकारी चले गये। पर सरपंच जी मेरे पास आए और कंन्धे पर हाथ रखकर बोले “आप इस साले प्रशान्त से कतइ मत डरिये। मै देखता हूं ये स्कूल बनाने से कौन आपको रोकता है।”
प्रशान्त हल्के से कान में फुसफसाए “काम हो गया”।और यह कहकर चलते बने ‘स्कूल का काम  शुरू कर दो’। मुझे अब सारा दृश्य समझ आ गया था।
रात मे मै प्रशान्त जी से खुद मिलने गया। उन्हाेने कहा – डेमोक्रेसी हो फासिस्टवाद हो या कम्युनिज्म हो या पूंजीवाद  हरेक  ‘इज़्म’ का एक सिस्टम है अगर आप कमजोर हैं तो आपको ये तो सीखना ही पडेगा कि उसकी ताकत आपकी ताकत कैसे बने। जूडो जापानी तकनीक इसका बहुत सुन्दर उदाहरण है। फिर प्रशान्त जी बोले “अभी एक दो फोन आपको आएगे मना मत किजीएगा। इसे बिल्कुल एसे समझिए जैसे
रावण जब मृत्यु शैया पर लेटे थे तो  भगवान राम ने लक्षमण को कहा कि जाओ दीक्षा लो क्योकि रावण महाज्ञानी है।और शिक्षा  सरपर खडे होकर नहीं पैरों में, बैठकर  ली  जाती  है। और हंस कर चल दिए।संवाद संकेत-आत्मक था।
कुछ दिन बाद प्रशांत के कहे अनुसार मुझे पहला फोन पटवारी का आया। बोले एक गुजारिश है
इतना तो आप कर ही सकते हैं। मेरी बिटिया ने बीएड किया है बस उसको मास्टरनी बना दीजिए। हर्ज भी क्या था मै बोला-रख लेंगे सर।
दूसरा फोन सरपंच जी का आया। बोले सर इतना काम किया है हमे कुछ नही चाहिए पैसे की हमारे पास कोई कमी नही है। बस हम चाहते है कि स्कूल का नाम हमारे दादा जी पर रख देगे तो आपकी कृपा होगी।.
………यह कहानी लगभग  सन २००० की है।
अगर इस कहानी को बिहार के चुनाव से जोडकर देखे तो ऐसा नही लगता कि कहानी दौहरायी जा रही है। इसमे प्रशान्त वही प्रशान्त किशोर नही लगते जिन्होने बिहार इलेक्शन मे नितीश कुमार के सर पर  जीत का सेहरा बांधने की अहम भूमिका निभायी। शशांक  जैसे नितीश की भूमिका मे नज़र आते हैं।

(Democracy has the power to absorb man(y) ‘ism)

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