मरघट पे गया..

images

मरघट पे गया, कुछ घट सा गया
कुछ लोग जुड़े, एक घर से गया।

Continue reading

Advertisements

Face book-चेहरों की किताब

         फेस बुक = चेहरों की किताब
फेस बुक बड़ा दिलचस्प प्लेटफार्म है। अपने दिल की बात खुलकर सबके सामने रख सकते हैं। आपको समस्याएं मिलेंगी उनके निदान भी मिलेंगे। अपेक्षा और उपेक्षा दोनो साथ एक ही पटल पर। सबको यह याद रखना चाहिए कि आप अगर फेस बुक पर कुछ डालते हैं तो ये पब्लिक डोमेन है। इसलिए ये ध्यान रहे कि आप जिस मूड में या जिस नज़रिये से कुछ पोस्ट करते हैं तो ये ज़रूरी नहीं कि सामने वाला आपकी सोच के अनुसार चलेगा। वो आपको अपनी मर्ज़ी  से या अपनी सूझ-भूझ से कुछ भी जवाब दे सकता है। हो सकता है न भी दे।
आपकी कोई निजी समस्या है या बातचीत है और चाहते हैं कि विशेष लोग ही टिप्पणी करें तो आप अपना एक  अलग ग्रुप बनाईए। वॉटस एप इस्तेमाल किजीए। किसी को कोई परेशानी नहीं होगी। और नही तो फिर बर्दाश्त करने का माअ्दा
रखिए। कोशिश किजीए कि सभ्य भाषा का प्रयोग हो। उदाहरण :
ट्रेन में एक व्यक्ति सफर कर रहे थे । रिज्रर्व सीट थी। तो कोई और सज्जन उनकी सीट पर आकर बैठ गये। गुस्सा तो आया पर तहज़ीब का भी तकाज़ा होता है। तो बड़े विनम्र भाव से उस शख्स की तरफ देखकर बोले “भाई साहेब आपके पिता जी का नाम क्या है? वह बोला श्याम लाल। तो जिन साहब की वास्तव मे सीट थी उनसे बोले
” कृप्या उठिए यह सीट श्यामलाल की नहीं है।”

अब यही बात अगर एसे कही जाए कि उठ जा ये सीट तेरे बाप की नहीं है। तो दो मिनट लगेंगे निपटाने में।

जनहित में जारी।

संसद का कैण्डी क्रश

              स़सद का  ‘कैंडी’ क्रश
आदम और हव्वा की कहानी में एक सेब आता है और फिर एक संसार बनता है। जैसे उस जमाने मे क्रश के ज्यादा ऑप्शन नहीं थे वैसे ही आजकल सिर्फ र्कैडी पर  ज्यादा crush है। क्या खेल है  साहब। ट्रेन मे,बिस्तर पर रात मे दिन में, ऑफिस मे, घर पर सब इसी मे लगे हैं।

राजनीति दुनिया भर की और नतीजा रत्ति भरका।
तेरी गली का ….मेरी गली में, बवाल दुनिया भरका।

कैण्डीक्रश मे भी रगंभेद के और क्लास के कुछ नियम है। एक ही सॉचे के जंहा तीन हो वहॉ बहुमत, पॉच तत्व एक कतार मे हो तो बिल्कुल क्लियर मेजोरिटी  और विस्फोटक। बार बार असफलता हो तो कुछ समय के लिये स्थगन आदेश। फिर दोस्तो से और दुश्मनों के गठबन्धन से भी दुबारा मौका मिल सकता है।
चस्का जीत पर भारी है और मस्का मुद्दों पर।
कब दिल को बहका देता है पता ही नही चलता। जो लोग नही खेलते वो खेलने वाले को नशे में बहका, बेल्ला (खाली) समझते हैं। आजादी के बाद से ही खेल चल रहा है, आपका बस ऑकड़ों में लैवल बढ़ रहा बिसात पर वहीं है। बीच में कभी कभी कैण्डी क्रश की तरह कुछ आइकॉन असंतुष्टों की तरह उभरते हैं वो क्योकि मियादी विस्फोटक है सारा खेल तमाम कर सकते हैं ।उन्हे समय सीमा में (डेफ़ुज़) संतुष्ट करना ज़रूरी है। बीच बीच कुछ मच्छलियॉ भी
फंसानी पड़ती हैं।उनको कब इस्तेमाल करना है
यह आपकी दक्षता पर निर्भर करता है।

खाली पीली सब पेल दी, हरी-भरी सब बेल*
संसद करे न चाकरी, ‘बाबूू’ की बनादी रेल।।

बेल-खाली बैठना

जिसने पी ही नहीं,
                  वो शराब का मज़ा क्या जाने।
डुबकी लगाने से पाप धुलते है ,                                                                                                                                                                       ये                चारासाज(डाक्टर) क्या जाने।

इलाज लत का दवाई से नही,
                               विवेक से होता है।
जिसने गुड़ खाया ही नहीं
           गुड की सी बात का मज़ा क्या जाने।

नशे मे ‘सुरुर’और ‘खुमार’
                              दो ऱगों के नाम है,
रातें कभी बे रंग नहीं होती,
                          रत्तौंधी वाला क्या जाने।

जिसे देखकर क्रश आए,
                  और वो खेलने की इजाज़त दे दे,
दिल तो बच्चा है जी,
                      औधो ज्ञानी लीला क्या जाने।

लोक माने राज्य न माने,
                              ये कौन सी सभा है,
ले दे के खेला(फिल्म) काम का,
                          संसद सैंसर क्या जाने।
खेल मे अभी ७२ घण्टे के लिए बर्खास्त है संसद फिर लगेगी।

हिन्दू धर्म

              
मैं हिन्दू हूं….
हिन्दू धर्म नहीं है।
यह कहने कि आज़ादी
कोई और धर्म नहीं देता है।
वो जीने का तरीका है
एक दिशा एक रास्ता है।

मेरी कहानी में ईश्वर ही अल्लाह है।
‘काफिऱ’ *शब्द का अर्थ
मेरा ज़हन को अब भी समझ नहीं आता है।

मेरी कहानियों में
मेरे बचपन का एक दोस्त
जिसका नाम ‘मोहम्मद’
मेरा पथ-प्रदर्शक बनकर आता है।
वो कोई और भी हो सकता था
मैं उसका नाम भी बदल सकता था।
पर जाने क्यों उसे ‘प्रॉफेट’ कहने में
मेरे मन को डर लगता है।

मेरे गले के भीतर
एक शिव सा
मन्थन चलता रहता है,
जो सारा अमृत
विषाक्त होने से बचा के रखता है।

कितने दिन और चलेगा
वो हान्डी का मक्खन।
ये डर इस भारत मॉ ने
सीने में छुपा रक्खा है।
“मथुरा में रहना है तो
राधे-राधे कहना पड़ेगा”
कितने ऊधव सरीखे ज्ञानीयों को
वो कहाना
ग्वाला बना के रखता है।

महाभारत एक पर
कई युद्धों का आभार
एक सत्य की कसौटी पर
जीत का परचम रक्खता है।
पर ज़िहाद* शब्द का अर्थ
मेरा ज़हन मेंअब भी
सीधे नहीं उतरता है।

काफिऱ=जो अल्लाह को न माने
ज़िहाद= jihad
noun
(among Muslims) a war or struggle against unbelievers जो अल्लाह को न माने
उनके खिलाफ युध्द/लड़ाई।

इक पहेली, सुलझी हुई थी गुंजल कर दी

“इक पहेली, सुलझी हुई थी गु्ुंजल कर दी
मुद्दतो खबर न ली उसकी, अब धरोहर कहै है
बचपन के ‘आई-स्पाइ’ सा वो खेला करे है,
आवाज़ देकर छुपता है, क्या ढोंग करे है।
वो डूबकर बड़बड़ाने लगा  ‘हर हर गंगे ‘
अब ब्लैक लेबल को जालिम अमृत कहे है “।

जहॉ फाके थे इन्सानियत केे
वहॉ मैने लोग बहुत कमाये
मैने गजल जब बेची अपनी
कीमत वो मॉगी, जो दिल दे जाए।

पत्थर वो मॉगा जो ठुकराया हुआ था,
ज़र्रे ज़र्रे में ठाकुर है ढूंढनेवाला चाहिए।
नुमाइश मे लगा है, यहॉ दिखावा  बहुत है,
अपनाने की चीज़ है, कौन सा खज़ाना चाहिए।

भूख को, प्यास को, पेट से अलग कर
आज एक व्रत लो कुछ अलग सोचना चाहिए।
मन का अपमान न हो,
दिल पर एतबार हाेना चाहिए।
अगर तरक्की के लिए है, तो व्यवधान का भी सत्कार होना चाहिए।

जिन शब्दों के साथ खेला किये, धीरे-२ मौन हो गये।
जुबॉ से उतरकर कान में कहते हैं कुछ मस्ती होनी चाहिए।
                

उसका तराज़ू उसी की मर्ज़ी, खुदा कहीं का

दो दिन में खर्च कर दी उसने
                         सारी जमा पूंजी,
पर एक एक मुस्कुराहट का हिसाब दे गया
                         गुलाब कहीं का।

मै तुझसे कुछ मॉगूं और, और तू मुझे
                           कुछ और दे,
उसका तराज़ू है,   उसी की मर्ज़ी
                          खुदा कहीं का।

एक मुक्कमल सिलसिला है गुजरने का
                     फिर भी कभी कभी,
क्यों बॉधकर रख नहीं सकते उन सॉसों  को
                            वक्त कहीं का।

शक्ल से मुक्कमल, आधे-अधूरे आदमी,
                    भुरि-भुरि सी ख्वाहिशें,
ऑखों का नशा, सधे हाथों पकड़ना चाहता है
                         ख्वाब कहीं का।

मुझे खिलना सीखा गयी, आवारा थी शोखियॉ,
ऑखों के सामने चोरियॉ।
कनखियों से मुखबरी, प्यारी सी वो गालियॉ,
लुच्चा कहीं का।