JNU वाद – विवाद के घेरे में

          JNU वाद विवाद के घेरे में

अभी JNU में जो हो रहा है वो दुखद है। कुछ  बुद्धिजीवी अभी उस धारणा पर विश्लेषन के स्तर पर हैं कि एक खाब दिवाने का है कि वो अपनी महबूबा की इज्जत करता है प्यार भी करता है और उसे निर्वस्त्र देखना चाहता है। ये सबको मालूम है अन्दर से सब नंगे होते है। पर पहले देश होता है उसकी सीमांए होती हैं। फिर एक घर होता है उसमें दीवारो के  साथ-२ दरारें भी होती हैं।  इन सबसे पहले एक इन्सान होता है। ये इन्सान आजकल गौण हो गया है। पर जो अपने आप को बुद्धिजीवी कहता है उसे यह  गल्तफहमी है कि वो GOD हो गया है।
क्योंकि वो ये जानता है कि आस्था आजकल भीड़ से होती है। कुछ सो या हज़ार लोग एकत्र हों। एक ही बात को दोहराएं। फिर वो परम्परा बनेगी और एक देश या धर्म जो उसके सपनों का है प्रतिविम्बित होने लगता  है। सपना तो कैसा भी हो सकता है। पर आप कैसे बुद्धिजीवि हो कि उसे और सुन्दर बनाकर  वास्तविकता के पटल पर नहीं रख सकते। पर ये ध्यान रहना चाहिए कि जिस देश में तुम रहते हो उसकी सीमॉए है। आप सीमा लॉघ रहे हो। आप कि आइडोलोजी किसी बाहरी आइडोलोजी से मेल खा सकती है उसे अपनाया भी जा सकता है। फूल अगर सुन्दर हो उसे तोड़ा जा सकता है। पर देश फूल नहीं है।

अभी कल मैं फेसबुक पर देख रहा था एक रिपोर्टर हाथ में माइक लिए एक कामगार से पूछ रहा था कि आप दिन कितना कमा लेते हो। वो बोला डेढ़ दो सौ रूपये। उसकी तरफ एक कागज़ का झण्डा बढ़ाकर रिपोर्टर ने दूसरा सवाल दागा
” लाख रूपया दूंगी इसे फाड़ दो”। उसने इन्कार कर दिया। क्या दिखाना चाहते हैं? उसे तो गॉव के किसी बुज़ुर्ग ने सादगी से सिखाया है कि देश की इज्जत करो देश के झण्डे का मान करो। ये उसके ज़हन में है।
किसी बच्चे को बचपन में कुछ अच्छा पाठ पढ़ाया जाए ठीक है। लेकिन उसे ये पाठ पढ़ाना की अगर कोई तुम्हारी बात न माने तो उसे गोली मार दो। गले नहीं उतरती ये बात।
अब मान लो वो आदमी झण्डा लेकर एक लाख मे फाड़ ही देता तो ।क्या ये शिक्शा जन्म लेते ही इस  तरह जूझना सिखा रही है। अभी कमा के देखा नहीं एजेन्ट बनने की तैयारी। महात्मा बुद्ध कहते हैं पाप  मत करो। महावीर कहते हैं पाप की सोचना भी अपराध है। वो उस दुस्वपन को जन्म देता है जिसका आधार ही गल्त है।

अभी (फेस बुक) कोई छात्रा बोल रही थी कि यही  बीजेपी पीडीपी से सन्धि सरकार कश्मीर मे चला रही है। जबकि अफज़ल गुरू के बारे पीडीपी का दृष्टिकोण किसी से छिपा नहीं है। तो ये बीजेपी हमारे अफज़ल गुरू के नारे लगाने पर आपत्ति क्यों जता रही है। तो ये देश की जनता पूछना चाहती है कि तुम कौन हो या बीजेपी कौन है ?
अरे एक चेहरा हो, बस देश नहीं  हो।
मुझे  जो महसूस हो रहा है कि JNU जिस इलाके में है दिल्ली के बीच में है। जिस दिन ये रोष सरकार के हाथ से निकलकर जनता ने अपने हाथ में ले लिया, उस दिन क्या होगा। अभी पढ़ रहा था, खबर है कि मुनिरका में JNU के शिक्षार्थियों
से मकान खाली कराये जा रहे हैं।
मेरी ये प्रार्थना है सभी बुद्धिजीवियों से कि ये संकेत ठीक नही है। सम्भलने का समय है। भीड़ जब जागरूक होती है तो वो गेहूं के साथ घुन पीसने मे हिचकिचाती नहीं है। यह सब भयावह है।

ये तो रूप बदल रहा है, अब तक गिरगट रंग बदलता था,
नसों में ये ज़हर कौन घोल रहा, मुनाफा कल तक  तो मण्डी में था।

ये देश विरोधी ‘नारा’ नहीं है, ट्रिज़न है देश टूट रहा है,
तिरंगा देखो डोल रहा, निज झंडो तले  नेता अपनी भाषा बोल रहा है।

ये निस्वार्थ नहीं है स्वार्थ है साथी, क्यो ऑखे तू मूंद रहा है,
एन्काउन्टर हुए क्या शहीद हुए, वो कानून की पट्टी खोल रहा है।

ये भीड़ राष्ट्रवाद की है, भेड़ नहीं जो ठेल रहा है,
भाड़ भी झौंके धन्धा है, तू चखने से अपनी ऑखे फोड़ रहा है।

मैं तो इन ‘वादों’ में उलझ कर रह गया,
उस वादे का क्या हुअा जो भरोसा दिलाया करता है।
जो वाद* राष्ट्र और देश में अन्तर  पैदा करदे,
उससे तो वो मास्टर बेहतर है जो सादगी का पाठ पढ़ाया करता है।
nationalism/patriotism *
जो आदतन चुप रहता है अच्छा है
पानी से ऊपर है, पर हाथपैर न मारे वो मुर्दा सा दिखता है।

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