A smoke from the NEWS corner

From news corner
1) Odd-even an insult, want out, say MPs
2) Better to dance than beg : SC Apex     court asks Maha government to regulate
Not prohibit dance bars in the state.
A Humanitarian say to MPs please do something good than to protest.
Odd even के मद्दे नज़र सन्दर्भ सहित टिप्पणी कीजिए
एक बार भगवान ने किसी को दर्शन दिए और कहा कोई ईच्छा जो चाहे मॉग लो। बस एक शर्त है कि जो मॉगोगे उससे दुगना पड़ौसी को मिल जाएगा।बहुत सोचने के बाद उसने कहा भगवन मेरी एक ऑख फोड़ दो।
दूसरा : एक नेता बोला चाहे मैं गाड़ी चलाऊंगा चाहे मेरा चालान हो।  पूछा एसा क्यों करोगे।
बोला एसा मेरे चरित्र में है। और मैने बचपन से यही शिक्षा ग्रहण की है कि ” चरित्र गया तो सब कुछ गया”
If character has gone everything is gone.
अरे भाई कोई है जो मेरा साथ दे
“मै बस चैन की सॉस लेना चाहता हूं” ।

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मयखाने में सिर्फ शराब नहीं कुछ और भी मिलता है

मयखाने में सिर्फ शराब नहीं मिलती
                      कुछ और भी मिलता है।
एक चिराग जलाने जितना,
                     कोने में अन्धेरा  मिलता है।

दर्द सज़ा नहीं है,
                    ये सबक तब जाना।
किताब को पढ़ने में जैसे,
         सर को कोहनी से सहारा मिलता है।

प्यार किताबी ज्ञान से परे,
                        बोझ और बोध जाना।
मेरे शाने पर उनका सर, और
         लम्बा सफर,कितनी आसानी से कटता है।

दर्द सह सको तो अच्छा है,
                            दर्द जब टाले नहीं टलता है,
खुद को बदलने से अच्छा
           जब आदमी अपनी आदत बदलता है।

मेरी हैरान कर देने की आदत से ये जमाना असमंजस मे था

मेरी हैरान कर देने की आदत से ये
ज़माना परेशानी में था।
मयखाने की ओर न जाने  क्यों कदम उठ गये,
शाम थी, और घर से शराब पीकर के निकला था।

न दम था शराब में कि कोई कशिश खींच लाती,
वही शाम को लौटा जो किसी सब्र की तलाश में निकला था।

मेरा घर मस्जिद और मयखाने के दरम्यॉ था,
खुदा की तलाश में बीचोबीच रहा कभी घर से दूर न निकला था।

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बारिश में छतरी हटा कर देख ली मैने अब तेरे बिना कुछ भी भीगता कहॉ है

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            संग साजन हो और सावन न हो
                 तो क्या फर्क पड़ता है
          और सावन हो, संग साजन न हो
                तो सब नरक लगता है।

रात मे कितने अन्धेरे है तू क्या जाने,
मै कितनी मुद्दत से सोया नही हूं, बताया कहॉ है।

दो लफ्ज़ प्यार के बोल दे, फिर टोहना,
अन्धेरा किसी का, किसी को रोकता कहॉ है।

वो टटोलता रहा, टोह खाली रही,
उसने छूने से पहले बताया जानॉ कहॉ है।

एक पल एक पहर सा गुज़रे है, अभी आता होगा,
यही रोमॉच कि उसने बताया नहीं वो पहुंचा कहॉ है।

बारिश में छतरी हटा कर देख ली मैने, तू कहॉ है,
तेरे बिना कपड़ों के सिवा, कुछ भीगता कहॉ है।

मैं जानता हूं अब भी तू मेरे साथ है जहॉ है
मेरे नाम का पल्लू अपने सर से तूने हटाया कहॉ है।

एक बावरे का फैसला

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               एक बावरे का फैसला

एक कच्ची बस्ती। एक छोटे से मकान के साथ जुड़ी एक खण्डहर नुमा इमारत। अवशेष गफलतों के दिवार में चिनवाए हुए किसी धर्म की दीवार से सटे खड़े हों जैसे। 
इस घर और खण्डहर का मालिक कबीर नाम का एक फकीर है जिसे लोग बावरा कहते हैं। अन्दर एक  पानी की बाउरी भी थी जो सूख चुकी है।उस पानी की बावरी से कभी हिन्दु सिख मुस्लमान सभी पानी भरते थे। उस खण्डहर की दीवारों पर कुछ उर्दू फारसी में कुछ लिखा है। एक दीवार गिरी पड़ी है उसकी दरार से एक मूर्ति झॉक रही  है। मानो किसी आनेवाली आपदा का जायज़ा ले रही ही हो। वो बावरा फकीर न जाने कौन धर्म से था। बस नाम से मुस्लमान लगता है। वैसे उसकी सारी गति-विधियॉ एक निखालिस अखण्ड भारतीयता की द्योतक थी।
फकीर की कोई जात न पूछे,
समझदारी है औकात न पूछे।
न जाने क्या मन्तर फूंक दे,
भस्म किसकी है कौन ऱाख न पूछे।

पहली बार महसूस हुआ उस फकीर को न जाने कौन सी नज़र लगी। और वो जो भगवान की मूर्ति झॉक रही थी एक दिन प्रकट हो गयी। दूसरे दिन दो धर्मो के गुट दावों पे दावे करने लगे। अब वो खण्डहर संसार का चर्चित स्थान हो गया।
बावरा फकीर दूरदर्शी था। उसने अगले ही दिन वो भूमि मन्दिर के लिए दान दे दी। अब विडम्बना देखिए। एक तरफ मुस्लमान उसके खिलाफ हो गये और वो जो कल तक बावरा  फकीर था अब कायर और गद्दार हो गया। दूसरी तरफ हिन्दुओं का एक गुट इसे ये कहकर गैरत पे ले बैठा कि दान नहीं हम हक से लेंगे। सियासत धर्म चलाती है या धर्म सियासत चलाता है असंमजस में हूं।
पर फकीर जानता है वो काफिर  नही है।
अल्लाह का बन्दा है, क्या गलत है भगवान को भी मानता है।
वो फकीर अपनी झोली चिमटा उठाकर ये गाता हुआ न जाने कहॉ चला गया :

ए जिन्दगी तुझसे मिल लूं गर इज़ाजत हो तो,
आईना पूछने आया है, तुझे संवरना तो नहीं।

वो देनेवाला बड़ा होता है तो होता होगा एक फकीर ने मन्दिर को जगह दी है
और फतवे का उसे मालूम ही नहीं।

छोड़ा तो उसके लोग उसे कायर समझे
दान में साथियों की गैरत आड़े आई,
मुकदमा मुल्तवी है उसकी अदालत है तारीख
कुछ बोलती ही नहीं।

ऑखों पर पट्टी बॉधकर सियासत ऱौशनी बॉटती  है
मेहमान खुदा है और मेजबान का पता ही नही।

‘*काफिर’ नाम के पत्थर की शिनाख्त में कोई कमी
रह गई शायद,
वो हीरा था या कंकड़ है अब तक उसे पता ही नही।

*काफिर- जो अल्लाह को न माने

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पिट्ठू की तरह हथेली पर सजाता है
फिर एक गेंद जिन्दगी की उछालता है
सपनों की तरह निशाने पर है बिखेरना
बटोरना पिसना हथेली पर रचाना है।
कभी हल्दी कभी मेंहदी
कभी बुटना कभी टकोर,
जो मुमकिन है सच है
क्या नमकीन बहाना है?

पत्थर के उन टुकड़ो को जोड़कर
पिट्ठू की शक्ल दे तो दी मैने,
ऊंचाई कुछ कम लगी तो पता लगा
दो टुकड़े सच छुपाकर गुमा दिए मैने।
बच्चों से लम्बी पारी खेलने का नुस्खा मेरे पास है,
जीती हूई बाजी हारना सीख लिया मैने।
वही दो पिट्ठू के टुकड़े तिजोरी में बन्द है,
उसपर दो महल बना लिए मैने।

“Better a diamond with a flaw than pebble “

‘काफिर’ नाम के पत्थर की शिनाख्त में
कोई कमी रह गई शायद
हीरा है कि शीशा है अबतक वो समझा ही नहीं।

ए जिन्दगी तुझसे मिल लूं गर इज़ाजत हो तो,
आईना पूछने आया है, तुझे संवरना तो नहीं।

ए मौत तुझे जिन्दगी से दोस्ती का न्यौता है,
नाराज़गी भी कोई नहीं,बस मेलजोल रखा ही नही।

परछांइयॉ जिस्म ढूंढ रही है बहुत बेरोज़गारी है,
इस दौेरे चकाचौंध में रौशनी को धूप मिली ही नही।

अब तो मन भी ऊबने लगा है इस ज़िन्दगी से,
और दिल है कि उसे धड़कने से फुरसत ही नहीं।

देख-भाल के ईश्क शम्मा परवाने का कभी इम्तिहान नहीं लेता,
वो एक ही तरीके से मरता है, नकल की कोई गुजांईश ही नही।

मयखाने में सब कुछ भरा पुरा है साकी है शराब है रिन्द हैें
खाक में जान फूंकने वालों का जलवा तुमने देखा ही नहीं।

मुझे जल्दी बुला लाए एक कच्ची गज़ल के साथ,
पत्थर मत मारना दोस्तों, मैं अभी पका ही नहीं।

मैंने कई बार सोचा कि मरके के देखते हैं,
मरने के बाद भी मरना, उसपर कुछ और सूझा ही नहीं।

काफिर-जो अल्लाह को न माने।