एक बावरे का फैसला

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               एक बावरे का फैसला

एक कच्ची बस्ती। एक छोटे से मकान के साथ जुड़ी एक खण्डहर नुमा इमारत। अवशेष गफलतों के दिवार में चिनवाए हुए किसी धर्म की दीवार से सटे खड़े हों जैसे। 
इस घर और खण्डहर का मालिक कबीर नाम का एक फकीर है जिसे लोग बावरा कहते हैं। अन्दर एक  पानी की बाउरी भी थी जो सूख चुकी है।उस पानी की बावरी से कभी हिन्दु सिख मुस्लमान सभी पानी भरते थे। उस खण्डहर की दीवारों पर कुछ उर्दू फारसी में कुछ लिखा है। एक दीवार गिरी पड़ी है उसकी दरार से एक मूर्ति झॉक रही  है। मानो किसी आनेवाली आपदा का जायज़ा ले रही ही हो। वो बावरा फकीर न जाने कौन धर्म से था। बस नाम से मुस्लमान लगता है। वैसे उसकी सारी गति-विधियॉ एक निखालिस अखण्ड भारतीयता की द्योतक थी।
फकीर की कोई जात न पूछे,
समझदारी है औकात न पूछे।
न जाने क्या मन्तर फूंक दे,
भस्म किसकी है कौन ऱाख न पूछे।

पहली बार महसूस हुआ उस फकीर को न जाने कौन सी नज़र लगी। और वो जो भगवान की मूर्ति झॉक रही थी एक दिन प्रकट हो गयी। दूसरे दिन दो धर्मो के गुट दावों पे दावे करने लगे। अब वो खण्डहर संसार का चर्चित स्थान हो गया।
बावरा फकीर दूरदर्शी था। उसने अगले ही दिन वो भूमि मन्दिर के लिए दान दे दी। अब विडम्बना देखिए। एक तरफ मुस्लमान उसके खिलाफ हो गये और वो जो कल तक बावरा  फकीर था अब कायर और गद्दार हो गया। दूसरी तरफ हिन्दुओं का एक गुट इसे ये कहकर गैरत पे ले बैठा कि दान नहीं हम हक से लेंगे। सियासत धर्म चलाती है या धर्म सियासत चलाता है असंमजस में हूं।
पर फकीर जानता है वो काफिर  नही है।
अल्लाह का बन्दा है, क्या गलत है भगवान को भी मानता है।
वो फकीर अपनी झोली चिमटा उठाकर ये गाता हुआ न जाने कहॉ चला गया :

ए जिन्दगी तुझसे मिल लूं गर इज़ाजत हो तो,
आईना पूछने आया है, तुझे संवरना तो नहीं।

वो देनेवाला बड़ा होता है तो होता होगा एक फकीर ने मन्दिर को जगह दी है
और फतवे का उसे मालूम ही नहीं।

छोड़ा तो उसके लोग उसे कायर समझे
दान में साथियों की गैरत आड़े आई,
मुकदमा मुल्तवी है उसकी अदालत है तारीख
कुछ बोलती ही नहीं।

ऑखों पर पट्टी बॉधकर सियासत ऱौशनी बॉटती  है
मेहमान खुदा है और मेजबान का पता ही नही।

‘*काफिर’ नाम के पत्थर की शिनाख्त में कोई कमी
रह गई शायद,
वो हीरा था या कंकड़ है अब तक उसे पता ही नही।

*काफिर- जो अल्लाह को न माने

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