वो खूबसूरत है ज़माने को खबर है,

वो खूबसूरत है ज़माने को खबर है
ये खबर उसको नहीं है, गनीमत है।

हैरान हूं क्योकर ठोकर लगी उन्हे, खुदा खैर करे
उनकी गली का हर पत्थर मुझसे मुतासिर*, मेरी   ईबादत है।
*मुतासिर-प्रभावित है।

उसकी चादर में छेद बहुत हैं पर अब भी बेदाग है,
ईमानदारी के ऑचल की खुदा खैर न करे, लानत है।

उसे फुर्सत ही नहीं है कि वो देखे जी के जंजाल
नादान दोस्ती से फुर्सत मिले तो समझूं के कयामत है

उसके छूते ही उम्र भर की नाराज़गियॉ छू मन्त्र हो गयी,
कलाई पकड़ के जब उसने हमसे पूछा,   कोई शिकायत है?

वो नज़र तक नहीं मिलाता जब ईधर से गुजरता है
लोग इसे क्यों शर्मिन्दगी समझ बैठे,ये अकीदत* है।
*अकीदत-सम्मान

दिवाना बनके मजनु हंसते हुए पत्थर जब खाने लगा,
पागलपन की जरा हद से गुजर जाना ही मगफिरत है
*मगफिरत – मोक्ष

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