Schizophernia सकिज़ोफेर्निया

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                  Schizophernia
                    सकिज़ोफेर्निया  

ये कहानी नहीं खाबों की एक दुनिया है। इसका तब तक पता नहीं चलता जब तक इसका ताना-बाना आपके ज़हन में और आपकी पुतलियों के भीतर है। इसका दायरा जब बाहर झॉकने लगता है तब फिक्र को जन्म देता है।
एक व्यक्ति जब खाब में होता है तो उसका संचालन कौन करता है? ध्यान दोगे तो बड़ा जटिल प्रश्न है। दिमाग आपका है शरीर आपका है ऑख आपकी है। ख्वाब आपका है। पर खाब आपके हाथ में नहीं है। यानी उसपर आपका नियन्त्रण नहीं है।

वो आम आदमी जो खाब और वास्तविक्ता को अलग अलग जी ले वो सक्षम और जो इस वास्तविक और खाबों की दुनिया को एक खुली ऑख से जीने की कोशिश करे वो पागलपन। दोनो के पटल अलग हैं। उन्हे अलग रखना मिक्स मत करना। बस यही मिक्स करने की ज़ुर्रत स्किज़ोफेर्निया नामक व्यक्ति की शारीरिक संरचना ने की। वो सिस्टम के विरूद्ध चला गया। ये तो शरीर की बात है, अगर आज देश मे सिस्टम के विरूद्ध कोई जाए तो येन केन प्रकेण उसे या हटा दिया जाता है या उसे पागल घोषित कर दिया जाता है।

आजकल इस तरह के पागलपन को थोड़ा सोफैस्टीकेटड नाम दिया गया  है ‘स्किज़ोफेरनिया’।
कहानी दिलचस्प लगती है सुनने में। इसका दर्द वही जानता है जिसके चेहरे पर तो हंसी है पर दिल में दर्द है और दर्द महसूस करने की कोशिका सुन्न है। ये भी एक सिम्पटम है जो सकिजोफेर्निया से ग्रसित व्यक्ति में होता है और नार्मल आदमी के पास भी रहता है पर वो उस हिस्से को मृत/डैड करने में सक्षम है। सही मानो में इसे सयंम कहा जाता है। पर अगर कोई आपका विरोधी है तो वो आपको बदनाम करने के लिए ये शक तो जाहिर कर ही सकता है कि कहीं ये पागल तो नहीं जो इतना दुखद समाचार भी बिना मुंह लटकाए सुना रहा है।

Reference number नो.1एक सन्दर्भ उठाते हैं
: एक डाक्टर ने इस बीमारी के लक्षण की व्याख्या में बताया कि एसा व्यक्ति जो किसी अपने की मौत की सूचना हंसते हुए सुनाए, या उस वक्त उसके चेहरे पर उदासी के भाव न हों तो एसा समझा जाएगा कि उसमे इस बीमारी के लक्षण है।
अभी आपको जो मैं कहानी सुना रहा हूं वो मेरे किसी अपने की लगभग सच्ची कहानी है। ये लगभग शब्द मै इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूं क्योंकि मै ये मानता हूं कि वो व्यक्ति खुद से बीमार नहीं है। उसे सिस्टम ने क्रमबद्ध तरीके से (systematically) बीमार किया है।

ये कहानी एक एसे व्यक्ति की कहानी है जो हिमाचल के एक छोटे से गॉव से होती हुई दिल्ली कालेज, नई दिल्ली फिर वहॉ से ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी लंदन तक पहुंची। इस व्यक्ति का नाम गोरखनाथ (नाम काल्पनिक) है। उसकी खासियत यह है कि पढ़ाई के हर मकाम पर अव्वल रहना उसकी आदत में शामिल है। तो फिर ये दिल्ली से school of Archaeology से ऑक्सफ़ोर्ड  यूनिवर्सिटी लंदन में research के लिए एक मात्र उनका चुना जाना कोई अतिश्याेक्ति न थी। वहॉ से रिसर्च के लिए ग्रीस भेजा गया।शोध का विषय अलेक्सेंडर दी ग्रेट से सम्बन्धित था।

मैं एक दिन घर पर बैठा जसपाल भट्टी का कॉमेडी (satire) सिरियल देख रहा था। सिरियल  रिसर्च स्कालरस पर था जिन्हे पढ़ाई के अलावा क्या पापड़ बेलने पड़ते है इसमें दिखाया है। अपनी रिसर्च पर अच्छे रिमार्क उन्ही स्कालर को मिलते हैं जो टीचर्स, फैकल्टी मेंबर्स की सेवा करते हैं। यहॉ तक दिखाया गया कि एक स्मार्ट स्टुडेन्ट वह होता है  जो बॉस का पप्पी (pet) घुमाकर डिग्री ले जाता है। या lecturer की लड़की से शादी करता है और डाक्टरेट की डिगरी दहेज में मिलती है। ये satire भी तो वास्तविक ज़िन्दगी से जन्म लेते हैं। इसका आभास, आभास नहीं मुझे विश्वास कहना चाहिए जो मुझे आगे चलकर अपनी  इस कहानी से हुआ।

एक रात अचानक एक बजे घर पर फोन की
घण्टी बजी। आशंका यही रहती है कि कोई इमरजेंसी होगी। और हुआ भी वही।  ग्रीस से फोन
था। समाचार था कि गोरखनाथ हस्पताल में है।
खैर उनके भाईसाहब कनाडा में रहते है। वो वहॉ पहुंचे तो उनका हाल देखकर हतप्रद से हो गये।
वो बेड पर बेहोश पड़े थे। उन्हे शॉक ट्रीटमेंट दिया गया था। कारण : वो (वॉयलेंट) उग्र हो गये थे।
प्रथम दृष्टया ही सब गल्त दिख रहा था। एसा तो किसी उग्रवादी के साथ भी नही होता। शॉक
ट्रीटमेंट देने से पहले मरीज़ और मरीज़ के रिश्तेदारों से पूछा जाता है। खैर उनको वहॉ से घर लाने की तैयारी की गयी।

लेकिन इस बीच वहॉ थोड़ी जानकारी हासिल करने की कोशिश की गई। गुत्थियॉ काफी उलझी हुई थी। सस्पेंस थ्रिलर की तरह।
पता लगा गोरखनाथ जिस शोध पर था वो ध्वस्त करने की कोशिश हुई। परिणाम स्वरूप वो चीखे चिल्लाए। उन्हे पागल समझा गया। और शॉक ट्रीटमेंट दे दिया गया। एक इंटरनेशनल स्टूडेंट को बिना एम्बेसी और रिश्तेदारों को सूचित किए एक डाक्टर की सलाह पर, सारे पैरामीटर ताक पर धर कर कोई कैसे इतना बड़ा निर्णय ले सकता है। ताज्जुब है।
मुझे विश्ववामित्र की कहानी याद आ गई। जैसे महर्षि विश्वामित्र को ध्येय से भटकाने के लिए इन्द्र ने मेनका नामक अप्सरा को भेजा था क्योंकि उनकी सत्ता को खतरा पैदा हो गया था वैसे ही इस कहानी में भी एक मेनका थी जो इन्द्र सरीखे ने तो नही भेजी थी पर उनके काम आ गई। वो मेनका अपने स्तर पर तो विफल हो गयी परन्तु गोरखनाथ को असफल कर गयी।
जिस दिन वो चीखे थे  उस दिन उन्हे ये अहसास हो गया  था कि कोई है जो उनकी रिकी  कर रहा है । कुछ पेपर गायब हो चुके थे। उन्हे यह भी
आभास हो चुका था कि उनका शोध अगर सिद्ध
हो जाता तो बहुत से नामी गरामी शोधों पर प्रश्नचिन्ह लग सकता था।
इतने साल बाद जब दोबारा उनके शोध पर सलाह ली गई तो पता लगा उस थीसिस में से कुछ  मुख्य फोटोग्राफ्स है जो गायब हैं। हमने कोशिश की कि वो रॉक जिसपर वो इंस्क्रिप्शन जिन चट्टानों पर वो लेख/चिन्ह गुदे हुए थे मिल जाएं और  लेख पुष्टि के लिए  दोबारा सबमिट हो, पर वो गॉव अब तरक्की की सड़क पर  निकल चुका है। वो चट्टान तोड़कर वहॉ एक सड़क निकाली जा चुकी थी।

एक फिल्म देखी थी Exorcist जिसका ओरिजिन केन्द्र ग्रीस ही है जहॉ एक पुरात्तववेता खुदाई में एक बॉक्स जिसमें satanic प्रेत की रूह  बन्द है,को गल्ती से खोल देता है वोह आज़ाद हो जाती है।(फिल्म ज़रूर देखिएगा)। यहॉ भी जैसे उस विषय को चुनना ही बाक्स को छेड़ने जैसा हो गया था। और दूसरा schizophrenia भी ग्रीक भाषा के दो शब्दों को जोड़कर बना है
Skhizein  +   phren.     यानी
  Split      +.   Mind

कुछ और शब्द जो इस तरह के रोग के लक्षण दर्शाते हैं जैसे illusion – मोहमाया  इस किरदार मे आप मेनका को देख सकते हैं लेकिन गोरखनाथ जैसा धर्मपरायण ब्राह्मण का उसमें धंसना नामुमकिन था। फिर एक और शब्द है
Dellusion जैसे उस रोगी को लगता है सरकार पीछे पड़ी है। तो यहॉ तो कुछ लोग systematically पीछे पड़े ही थे।  फिर hulluaciation मतलब आवाज़ें सुनाई देना। क्या ये स्थिती create  करना मुश्किल काम है।
मुझे एक मशहूर शेर याद आ रहा है शायर का नाम तो याद नही पर हॉ जगजीत सिंह द्वारा गाया गया है
मेरा हॉकिम ही मेरा कातिल है
क्या मेरे हक में फैसला देगा।

यहॉ  मैं एक उद्दरण  और देना चाहूंगा।
विश्वामित्र ने तो गायत्री (महामन्त्र) सिद्ध कर ली
और वो महर्षि की उपाधि से सुसज्जित हुए। पर
हमारा गोरखनाथ इस क्रिया मे Schizophernia  सकिज़ोफेर्निया नामक बीमारी के तगमें से सुसज्जित  हुआ पर उन्हे महर्षि विश्वमित्र की गायत्री अब भी बचाए हुए है और वो जीवित है।  उन्होने गायत्री को नहीं छोड़ा है या यूं कहें उन्हे गायत्री नहीं छोड़ती है। पर इतना ज़रूर कह सकता हूं कि अगर कोई गूरु वशिष्ठ * सरीखा उन्हे उस फैकल्टी में मिलता तो आज उनकी ये हालत नहीं होती। He is now just like a vegetable. Know why this product is not for sale but to admire
पर गायत्री जाप की वजह से वो सब्जी आज भी ताज़ा जीवित है हरी-भरी है। सत्ता के और सिस्टम के प्रति अब उनका रोष देखने को मिलता है। अब भी वो रोज़ चिट्ठियॉ मिनिस्टर्स को उच्च पदस्थ अधिकारियों को लिखते रहते हैं। जिसमे उनकी फ़्रस्ट्रेशन देखने को मिलती हैं। और दिलचस्प बात ये है कि जैसे Schizophernia  सकिज़ोफेर्निया के रोगी बोलते हैं कि उनका कोई पीछा कर रहा है। देश के फ्लॉ हिस्से से घुसपैठ हो रही है। कई दफा तो यह बात सच हुई और बार्डर पर  कई घुसपैठिए मार गिराए गये। यह पागलपन नहीं intusion है। पर सरकार ने इस स्कालर को उनके हाल पर छोड़ दिया है। बल्कि एक एहसान है कि सिस्टम को इतनी गालियॉ देने के बावज़ूद  सियासत ध्यान (कान पर जूं न रेंगना) नहीं देती है। Thanks for the casual attitude.

ओर यह कोई नई बात नहीं है कि National heritage  का status पाने के लिए उस इमारत का खण्डहर होना ज़रूरी है। इस उम्मीद से उस धरोहर को अब भी कोई है जो उसे सम्भाले हुए है।
*
*At that time Sage vasistha and sage vishwamitr were great competitor (later become best friends). Vishwamitr wanting to be his equal, he strove with all his might and revealed Savitur gayatri mantra while to sage vasishtha was revealed maha mrityunjay mantra. Both are mokshadaya mantras. It is said that Gayatri mantra reveals the entire universe while Maha mrityunjay releases one from universe.  Means when you come to know the universe, you will also know The Reality beyond universe and so you will be released from delusion and sorrow. By Swami Swaroopananda’s book महा मृत्युन्जय

हॉ सपनों को मैने सच मान ही लिया था,
तुम डाक्टर न होते, तो मैं बीमार न होता।

वो जिसने पहली बार उड़ने की सोची, उड़ गया,
वो उड़ता कैसे अगर बीमार न होता।

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