सूरज जब निकले वो रात चाहता है, उसपर वो सूरज से गवाही और मुआवजा चाहता है।

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प्यार का संसार, एक आसमान मेरी छाँव चाहता है,
दिल का धड़कना, दो बॉहों में समेटना चाहता है ।
गुस्से का हक है उसे जो अपना समझे,
जंजाल दुनिया भरका न हो और नादॉ से दोस्ती भी चाहता है

प्यार में वो गारंटी मॉगता है और
समझौता दिल का कागज़ पर चाहता है।
हमने दिल पर हाथ रखकर शपथ ली,
तू दिन को रात कहे  वो रात कहता  है।
सूरज जब निकले वो रात चाहता है,
उसपर सूरज से बेगुनाही का मुआवजा चाहता है।
ये इश्क है कोई पूछे तू कौन,
मैं खॉमखा ! और अपने हक में फैसला चाहता है।
वो साथ है, नींद कहॉ आती है और
जब वो दूर हो तो नींद को सिरहाने चाहता है।

ये इश्क है पगले, अन्धा है
जो तू भी न देख सके, वो वही बखेड़ा चाहता है।

बात कही, सुनी जाती है
नादान से कहा-सुनी कौन चाहता है।
दूर तक साथ मौहब्बत की चॉदनी चले
कुछ ढोर सी का फासला पकड़कर देखना चाहता है।
मै ऑख बन्द करता हूं तो दिखता है
खोलूं तो नदारद,
तू खुदा है तो ये भी कर
इसको सम्भाल,
मेरा दिल क्यों बैठना चाहता है।

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