फुटपाथ से बैंच तक की ऊंचाई, नेता ने अभिनेता को सुनाई, व्यंगकार ने मसाला डालकर शराब के साथ चाट खाई।

​अभी मैं एक फेस बुक पर पोस्ट पड़ रहा था कि फलॉ फलॉ एक्टर जैसे अमिताभ बच्चन, जानी वॉकर वगैरह वगैरह अपने जीवन के शुरूवाती दौर में स्ट्रगल करते हुए रातें बैचपर सोकर गुजारीं। कोई नेता होता तो बैंच की जगह फुटपाथ शब्द का इस्तेमाल करता शायद क्योंकि जो जितना नीचे गिरता है वो जब उठता है तो उतना ही ऊपर उठता है।
कुछ लोग शर्म से  नहीं बताते हैं और कुछ गर्व से बताते हैं कि हमने इस शहर में रातें बैंच पर सो कर काटी हैं। ये दोनो लोग एक ही हैं। बस इस ओर बैठकर उस पार की कहानी सुना रहे हैं।

​रकीब चुनना भी लियाकत की बात है मेरे महबूब, वो एसा क्या था जो उसमे है मुझमे नहीं है।

रकीब चुनना भी लियाकत की बात है मेरे महबूब,
वो एसा क्या था जो उसमे है मुझमे नहीं है।

इस दिल को तेरे सिवा कुछ और दिखाई दे तो कुछ और सूझे,
कम्बखत ऑख भर सोचता है, रातभर सोता भी नहीं है।

वो जब भी इस गली से गुजरा है किसी इरादे से गुजरा है,
खाली और अकेलेपन में फर्क होता है,उसे़ समझ में आया नहीं है।

घुमा फिरा के कोई हमारी सीधी सी कहानी हमी को सुना गया,
बस तरस खा के बता रहा था हम इतने बुरे भी नही है।

मुझे भी कोई बिमारी का बहाना देकर रुखसत कर दे,
ऐ मौत तुझे मेरी खातिर आदत बदलने की जरूरत नही है।

मैं कच्ची मिट्टी के बर्तन बनाता चला गया,
मेरी गज़लों सा तुम्हे पकाने वाला मिला ही नहीं है।
मिट्टी के बर्तन में, मिट्टी अपनी जगह है,
कुम्हार ने मिट्टी के माधौ को पूरी तरह समझाया नहीं है।

कुछ तो बदला ज़रूर है,    ये गाड़ी किसके सहारे चल रही है…

कहीं कुछ बदला नहीं है

हैवान जानता है ये दुनिया सिक्का डालने से चलती है,
और इन्सान सोचता है ये शराफत से चल रही है।

कहीं कुछ  बदला नहीं है

गाड़ीवान अपनी गाड़ी दो बैलों से खिंचवा रहा,
और सोचता है ये गाड़ी उसी के हॉकने से चल रही है

पर कहीं कुछ तो बदला है

  

सुख-दुख सदियों से शामिल हैं
किसी गहरी साजिश में,
रहते हैं एक ही छत के नीचे
दुश्मनी है नहीं कोई पर दिख रही है।
सुख-दुख के बीच (-)हायफ़न सा फंसा आदमी
सुरागों की कडी हाथ मे लिए
सदा यही सोचता है जैसे –
चलती बैलगाडी के नीचे,
जलती लालटैन के साथ
चलता हुआ  “पालतु कुत्ता”
सोचता है कि  –
ये गाडी उसी के सहारे चल रही है।

और कही कुछ और है जो बदला हुआ है

गाड़ी के नीचे चलता हुआ कुता इधर उधर हुआ है
स्वामी भक्ति की जगह सत्ता, चापलूसी से चल रही है।

ये गाड़ी किसके सहारे चल रही है………….

पुराने पन्नौ की तरह परत दर परत वहीं से खुली ज़िन्दगी,               उन्ही से बचता फिरा जिन सवालों के जवाब तंग बहुत थे।

 मुड़े हुए पन्ने, सुखे हुए फूल, ज़ारज़ार कागज़,      मिलनसारी के नतीजे संजिदा बहुत थे।

मैने जब भी किताब खोली, कम्बख्त वहीं से खुली,.       जिन पन्नों पर जिन्दगी के दवाब बहुत थे।

मेरा अतीत उस वक्त उसके प्यार को परखता कैसे           उस दौरान मेरे उसपर एहसान बहुत थे।

पुराने पन्नों की तरह परत दर परत वहीं से खुली ज़िन्दगी उन्ही से बचता फिरा जिन सवालों के जवाब तंग बहुत थे।

अलग-अलग चिरागों ने  “रौशनी” कहीं कम तो कहीं ज्यादा दी….. 

अलग अलग चिरागों ने 

     ” रौशनी ”

कहीं कम तो कहीं ज्यादा दी ,

   और जब बुझ गये तो

सबने अन्धेरा बराबर  बॉटा है।

चॉद सबके हिस्से में बराबर 

आया 

उस चॉदनी रात में,   

सबके हिस्से  मे कलेजे की ठंडक को क्या उसने

सच में  बराबर बॉटॉ है।

जल्दी-२ का एतबार कैसा, फूलों के व्यवहार जैसा।

​जल्दी जल्दी का एतबार कैसा
फूलो के व्यवहार जैसा।

हवा में खुशबू तो है
इत्र है कि फॉग डियो जैसा ।

 

उसको चाहने वाले और भी बहुत हैं
मुंह बना के बोले ‘अच्छा एसा’।

हमने तो यूं ही पूछ लिया था हालचाल,
पतझड़ है तो कैसे होगा बहार जैसा।

हम कोई फूल नही जो बस दो दिन को खिलें,
कांटा है चुभता रहेगा ताउम्र कांटे जैसा।

हवाएं जिधर गई उधर की हो गयीं,
अफवाहों का पक्का है करेंगी कुछ एसा-वैसा।

जब भी कोई दामन थामने लगता है,  जाने क्यों कॉटों का डर सताने लगता है।

जब भी कोई दामन थामने लगता है,

जाने क्यों कॉटों का डर सताने लगता है।

कभी फूलों की सोचता हूं तो सिहर उठता हूं,

दो दिन का वक्त तो इन्तज़ार की थकान मिटाने में लगता है।

बेशुमार कलियॉ और इफरात फूलों काे मिलाकर,

सारा ज़ोर बहारों का मुरझाए ज़ख्मों को छुपाने में लगता है।