कहावत है “डायन एक घर छोड़ देती है”  जब दिल आ ही गया बस संजिदगी छोड़कर।

कश्ती हाल पूछती रही किनाराे का रूक-रूककर,
दरिया  खिसकता चला गया ज़मीन छोड़कर।

मुसाफिर खुदको नहीं बदलता, पानी बदलता है,
लोग बिखरे हुए मिले मुझे मयखाना छोड़कर।

वो जिससे इलाज हो जाए, वही दवा समझी जाए,
वो डायना क्या बुरी है एक घर छोड़कर।

Advertisements

एक फलसफा

​             ​एक-फलसफा
बड़े बड़े मकान, कमराें की तरह बंट गये अपने,
जो लोग तंग रहते हैं अक्सर संग रहते हैं।

खुशी तो जाहिर हुई, मगर कुछ एसे करते हैं,
तालियों में भी जेबों मे रहें, हाथ फैलने से डरते हैं।

मुफलिसी के सदके, कुछ खोने का डर नहीं,
खर्ची भी कुछ नहीं, उनकी गुंजाइश से डरते हैं।

कटाेरे को देखकर, भिखारी की दुआ याद आई,
मतलब पड़े तो सभी रास्ते मन्दिर का रूख करते हैं ।

मुझे अपना अस्तित्व बचाने के लिए खुद को कैद करना पड़ा,                 अन्दरूनी ताकतों को तुमने कहीं इस तरह रौशनी छोड़ते देखा।

मैं एक ज़रिया हूं, टूट भी सकता हूं,
सलाखों के पीछे रौशनी है अन्धेरे ने झॉककर देखा।

मैने कल एक खाब देखा,
आज वही एक हकीकत देखा।
जो सोचा था सामने से
उसे आज ही रूबरू देखा।

मैं जिसके साथ रूबरू था,
उसको मैने गुज़रते देखा।
दरअसल उसने मुझे गुज़रते देखा,
अब,उसने सच को खाब होते देखा।

दरख्तों ने गाड़ी को पटरी से गुज़रते देखा,
और गाड़ी ने गॉव धरती पर छूटते देखा।
मैं पिंजरे मे खुदको बन्द न करता तो क्या करता,
शेर शिकार पर है जंगल में खुली मार पर देखा।

लोगों को मुसीबत लगी, मैंने गले से लगा ली, गरीबी कुछ नहीं मॉगती एक हाथ सहारे के सिवा।

मेरे ज़हन से जब शब्द कागज़ पर उतरते हैं,
तो वो जाने क्यों अपना मायना बदल देते हैं।

एक वो फटे हाल कपड़ों से झॉकता जोबन है,
फिर क्यों काटकर पैराहन* में न्यूड का नुक्ता लगा देते हैं।

क्या इतना ज़रूरी था रदीफ काफिए में तालमेल बैठाना,
गज़ल रख लेते हैं किरदार मिट्टी में मिला देते हैं।

तो दोस्तों गज़लसराह वही है जो सच को बचा लाए,
झूठ तसल्ली के लिए और सच दिलको छुआ देते है।

पैराहन*कपडा़

Can you read between the lines  मेरे बदन की लिखावट पढ़नेवाले।

तब भी तू जिसे खिलखिलाना समझ रहा था,
तू आज भी वहीं खड़ा है नाहक गुदगुदाने वाले।

Can you read between the lines 
मेरे बदन की लिखावट पढ़नेवाले।

चित्रकारी के हुनर में  तुझे नुक्स बहुत मिलेंगे
तू खटकेका फोटोग्राफर है खूं को रगं समझनेवाले।

 करीने से सजी इन कतारो में, मेरी दिलचस्प कहानी पढ़ने वाले 
‘झुर्रियों’ में क्या खाक पढ़ेगा कमज़ोर नज़रिए वाले।

 समन्दर को तो बात सिर्फ सुनाने की है, प्यास तो चुल्लु भर है न मिले तो मर जाने की है।

समन्दर को तो बात सिर्फ सुनाने की है,
प्यास तो चुल्लु भर है न मिले तो मर जाने की है।

कई बार सोचा मलाल से पूछूं के ए कमजर्फ*,
वो खेत क्यों चुना जिसे चिड़िया चुग जाने की है।

अगर एतबार न भी हो, प्यार क्यों नफरत में बदले
सियासत हर हाल कमाती है और खबर चंडूखाने की है।

कमजर्फ-अयोग्य*

काफिया रदीफ गज़ल की पटरी पर


          काफिया और रदीफ
ग़ज़ल में शब्द के सही तौल, वज़न और उच्चारण की भाँति काफ़िया और रदीफ़ का महत्व भी अत्यधिक है। काफ़िया के तुक (अन्त्यानुप्रास) और उसके बाद आने वाले शब्द या शब्दों को रदीफ़ कहते है। काफ़िया बदलता है किन्तु रदीफ़ नहीं बदलती है। उसका रूप जस का तस रहता है।
जितने गिले हैं सारे मुँह से निकाल डालो
रखो न दिल में प्यारे मुँह से निकाल डालो। – बहादुर शाह ज़फर
इस मतले में ‘सारे’ और ’प्यारे’ काफ़िया है और ‘मुँह से निकाल डालो’ रदीफ़ है। यहां यह बतलाना उचित है कि ग़ज़ल के प्रारंभिक शेर को मतला और अंतिम शेर को मकता कहते हैं। मतला के दोनों मिसरों में तुक एक जैसी आती है और मकता में कवि का नाम या उपनाम रहता है। मतला का अर्थ है उदय और मकता का अर्थ है अस्त। उर्दू ग़ज़ल के नियमानुसार ग़ज़ल में मतला और मक़ता का होना अनिवार्य है वरना ग़ज़ल अधूरी मानी जाती है। 

ज़िन्दगी के मुत्तल्लिक आफताब से उगते डूबते रहे दिन, बिताने को एक खिलौना एक ज़िन्दगी रोज़ाना गिन।

वो अल्हड़ मस्त बेपरवाह फसादी, जवानी वायदों ने बरबाद कर दी,
वो काफिया रदीफ गज़ल से हिसाबी   रूहानियत कायदों ने बरबाद कर दी।

काफिये कि तरह हम तो उसूलन बदलते रहे,
ससुरी रदीफ सी अड़ी ‘ठेका’* लगाके गज़ल को सराब कर दी।

हम सोए रहे आफताब सी निकली मतला बरबाद कर दी,
शाम घटा बहुत रही ज़र्रा सी महताब सी निकली मकता बरबाद कर दी।

*ठेका – तबला या ढोल बजाने की वह रीति जिसमें पूरे बोल न निकाले जायँ,केवल ताल दिया जाय।
राकेश कुमार डोगरा