काफिया रदीफ गज़ल की पटरी पर


          काफिया और रदीफ
ग़ज़ल में शब्द के सही तौल, वज़न और उच्चारण की भाँति काफ़िया और रदीफ़ का महत्व भी अत्यधिक है। काफ़िया के तुक (अन्त्यानुप्रास) और उसके बाद आने वाले शब्द या शब्दों को रदीफ़ कहते है। काफ़िया बदलता है किन्तु रदीफ़ नहीं बदलती है। उसका रूप जस का तस रहता है।
जितने गिले हैं सारे मुँह से निकाल डालो
रखो न दिल में प्यारे मुँह से निकाल डालो। – बहादुर शाह ज़फर
इस मतले में ‘सारे’ और ’प्यारे’ काफ़िया है और ‘मुँह से निकाल डालो’ रदीफ़ है। यहां यह बतलाना उचित है कि ग़ज़ल के प्रारंभिक शेर को मतला और अंतिम शेर को मकता कहते हैं। मतला के दोनों मिसरों में तुक एक जैसी आती है और मकता में कवि का नाम या उपनाम रहता है। मतला का अर्थ है उदय और मकता का अर्थ है अस्त। उर्दू ग़ज़ल के नियमानुसार ग़ज़ल में मतला और मक़ता का होना अनिवार्य है वरना ग़ज़ल अधूरी मानी जाती है। 

ज़िन्दगी के मुत्तल्लिक आफताब से उगते डूबते रहे दिन, बिताने को एक खिलौना एक ज़िन्दगी रोज़ाना गिन।

वो अल्हड़ मस्त बेपरवाह फसादी, जवानी वायदों ने बरबाद कर दी,
वो काफिया रदीफ गज़ल से हिसाबी   रूहानियत कायदों ने बरबाद कर दी।

काफिये कि तरह हम तो उसूलन बदलते रहे,
ससुरी रदीफ सी अड़ी ‘ठेका’* लगाके गज़ल को सराब कर दी।

हम सोए रहे आफताब सी निकली मतला बरबाद कर दी,
शाम घटा बहुत रही ज़र्रा सी महताब सी निकली मकता बरबाद कर दी।

*ठेका – तबला या ढोल बजाने की वह रीति जिसमें पूरे बोल न निकाले जायँ,केवल ताल दिया जाय।
राकेश कुमार डोगरा

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