“I love you” in indirect form: Grammatically 

​मैंने इतनी शायरी पढ़ी है पर मुझे ये बात कहीं नहीं दिखी
आपने direct indirect अग्रेज़ी मे पढ़ा होगा पर उस पढ़ाई का क्या फायदा जब आप सर उठाकर प्यार भी न कर सको।&nbsp खुदा के सामने :

Direct indirect सीखने का हमने फायदा उठाया है,
सिर्फ हमने खुदा से मॉगा है मैं पहले अपने सनम के द्वारा (इज़हार) चाहा जाऊं ।

“I love you” I have rarely seen this sentence in grammar or practically, verbally or written in indirect form.

वो अभिव्यक्त कर गया इशारों में,

मुझे शब्द नहीं मिले किताबों में।

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किस्सा एक कबाड़ी का : समर सिंह की अमर कहानी

Kissa ek kabadi ka

                     किस्सा एक कबाड़ी का
समर सिंह की अमर कहानी हमारी मार्किट के मशहूर कबाड़ी वाले के लड़के का नाम समर सिहं था। ये बात उन दिनों की है जब हम स्कूल में पढ़ते थे। हमारी क्लास में समर सिहं नाम का लड़का पढ़ता था। पढ़ाई में एवरेज था लेकिन waste matrial से प्रॉजेक्ट बनाने में अव्वल था। शायद अपने पिता की विधा उसमें कूट-२ कर भरी हुई थी। बचपन में अक्सर देखा है कि अपने नाम से कोई मशहूर हो न हो पर अपनी छेड़ (निक-नेम) से मशहूर हो जाता है। उसको सब साथी कबाड़ी के नाम से ही जानते थे। और वो इसमें खुश रहता था।
मैने उससे पूछा भी की सब तुझे चिढ़ाते हैं पर तू चिड़ता नहीं है किस मिट्टी का बना है। उसने जवाब दिया कि कभी मोहल्ले में, स्कूल में किसी भी बच्चे बूढ़े जवान से पूछना ‘कबाड़ी’ कौन है। सब बता देंगे। कभी अपने असली नाम को पुछवाना बहुत कम लोग जानेगें अगर तुम एवरेज हो और अव्वल नहीं हो तो। और दूसरे पढ़े लिखो की तरह इसे सस्ती लोक प्रियता का नाम मत दे देना। ये आर्ट है। मुझे पानी में मछली तलना आता है। मैं अपने आप को ज्ञानी तो नहीं मानता हूं। लेकिन इतना समझता हूं कि एक पीएचडी मेरे घर पर सौ रूपये एक घण्टा के हिसाब से दिहाड़ी पर पढ़ाने आता है। पैसे में बहुत ताकत है।
मेरे बाप के पास पैसा बहुत है। ये जो मैने कहा कि पानी में मछली तलना मुझे आता है ये विधा मेरे बाप के पास है। और मैने भी ठान रक्खी है कि इस बिजनेस को आगे बढ़ाउंगा और एक दिन मैने मूत में मछली तलकर अपने बाप को नहीं दिखाया तो मेरा भी नाम ‘कबाड़ी’ नहीं। हॉ नहीं तो।
उस दिन मुझे महसूस हुआ कि अन्दर ही अन्दर ये ‘कबाड़ी’ नाम से कितना चिड़ता है। अन्दर कितना सुलग रहा है। और धन्य है ये समर सिंह जो इस आग से जल नहीं रहा है उसे कन्ट्रोल में रख कर अपने मकसद को पकाने में इस्तेमाल कर रहा है।
मैने उससे एक दिन पूछा कि आखिर इस धन्धे मे है क्या।बोला सच बता दूंगा तो शायद एक प्रतिद्वन्दी और पैदा हो जाए। फिर तीखी सी हंसी हंसने लगा।बोला सबसे बढ़ी बात इसमें कोई लागत नहीं है।अगर है तो बहुत थोड़ी। और बड़ी बात ये है कि जितनी बड़ी लागत उतना बड़ा व्यापारी।
दोस्त दो रुपया का दो सौ करने में दो महीना और
दो लाख का दो कराेड़ करने में एक महीना। पढ़े लिखों के सभी गणित फेल। एक छोटे से कमरे में कबाड़ भरकर फिर उसे बेचकर ये धन्धा शुरू किया था। हमें कोई शो रूम तो नहीं चाहिए था।
बस जगह चाहिए थी। दूर दराज में कौड़ियों के भाव जगह खरीदी ताकि जो कबाड़ खरीदे स्टोर कर सकें। आज वो जगह करोड़ो की है, कब कोई शहर के बीच में आ जाए पता नही।

बोला एक किस्सा सुनाता हूं। जब ये धन्धा परवान चड़ रहा था तो पहली दफा मेरे पिता मुझे साथ लेकर एक हवेली में कबाड़ की बोली लगाने के लिए साथ ले गये। वहॉ और भी कबाड़ी बोली लगाने आए हुए थे। सारा हवेली का समान सामने आंगन में display पर था। और बोली सारे सामान की एक लगनी थी। कम से कम बोली एक लाख से शुरू होनी थी। दस दस हजार से बोली बढ़ रही थी। दो लाख पर आकर कुछ थम गयी।
तभी अचानक मेरे पिता उठे और बोली तीन लाख बोल दी। मैने हाथ दबाकर बोला आप गलती तो नही कर रहे हैं। पलट के बोलै “नहीं”।
एक दो तीन और हथौड़े पर सारा सामान हमारा।

घर आकर पापा ने बताया जब भी बोली लगानी हो बस यही देखना है कि सामान का चरित्र कैसा है।

“मैं समझा नही”

बताता हूं। इस सारे सामान में सोफा सेट है डबल बैड है, म्युज़िक सिस्टम है, साईकिल है वगैरह वगैरह और एक पेन्टिग है। ये पेन्टिग अभी भी जिन्दा है। और मै जानता हूं ये पेन्टिग मेरी लागत है और बाकी मेरी प्रॉफिट है। अब मैं समझ गया। और वही पेन्टिग इलेक्शन के दिनों में एक मिनिस्टर ने खरीद ली मुंह मॉगे दामो पर। तो धन्धे का एबीसी इस तरह सीखा और प्रेरणा पाकर एक कम्पनी बनाई। जिसका नाम रखा ABCCorp .

अब मैं एक कम्पनी का मालिक हूं। और इसी तरह मै अब बड़े बडे़ ठेके उठाता हूं। राजनिती दरअसल बहुत बड़ा गारबेज है जहॉ कूढे़ की कमी नही है। सभी लोग राजनिती के बुरेपन से वाकिफ हैं लेकिन ये भी सच है कि बूरी राजनिती में अच्छे लोग भी हैं। और सौ लोग एक सच्चे को बार बार दोहराकर अपने जैसा झूठा बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

फिर मै टीवी पर न्यूज़ देखने लगता हूं। उसपर ये
खबर है कि आजकल अमर सिंह जी एक आक्कलन के अनुसार मुलायम सिंह जी और अखिलेश जी के बीच एक सांमजस्य बैठाने में सफल हो जाएंगे ।

तो सीख ये मिलती है कि जो commodity में deal करता है वो जानता है कि कबाड़ का अपना एक करैक्टर होता है जो संवेदनाओं से नहीं बदलता पर आदमी का बदलता है।

दिवाली पर सभी को बधाई, हाथ का मैल दौलत कहलाई।                   दिया प्रकाश है, मशाल क्रान्ती कहलाई।

कभी तो हवा लगाओ उन चरागों को,.                       अन्दर की नमी से वरना सीलन बाहर आने वाली है।

हमने भी लबादे से बाहर अपनी रूह निकाली है,
अन्धेरों ने दरवाजे पर दस्तक दी है आज दिवाली है ।

इस बार दिवाली पर मैने मिठाई नहीं बाटी,
गरीब की थाली में रोटी डाली, दिवाली मुस्कुराने वाली है।

सड़क के किनारे भीख मागंतीे बच्चियों को किताबे बॉटी,   कल वो अपने ऑगन दीप से दीप जलाने वाली हैं

वो अभी लौटकर नहीं आया है वक्त लगेगा, न जाने कौन से कुंभ में संगम होगा।

क्या इसको भी दरवाजे पर इन्तजार किसी त्यौहार का है,
ये वो शम्मा नहीं लगती जो सिर्फ दिवाली पर जलती है।

Play: Husband wife: नाटक शुरू

Play: हस्बैंड-वाइफ       नाटक शुरू

Wife: इस साड़ी में मैं कैसी लग रही हूं।
Husband: बहुत सुन्दर।
जब दोनो इकट्ठे बाहर निकले तो
 wife सलवार कमीज़ में थी।
Husband: जब अपनी मर्जी करनी थी तो पूछा क्यों?

लड़ाई शुरू

पटाक्षेप  यानी पर्दा गिरता है

ज़िन्दगी शुरू।

इस नाटक को आगे बढ़याइये और निम्न कोई दो मुहावरो का प्रयाेग किजीए:
१ . राई का पहाड़ बनाना
२.  अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे
३. नादान की दोस्ती जी का ज़जाल।
४. जब घर में आग लगी तो दोनो एक ही दरवाजे से बाहर निकले 

मुझे गिरना नहीं आता, मैं छलक जाता हूं,             बहका दिया किसी ने मयखाने से लड़खड़ाता निकला ।

​मै जब भी रोकर बाहर निकला
अन्दर से नहा कर निकला।
मेरी ऑखो के कपाट खुले जैसे
दिवार पर टंग़ा आईना  निकला।

आईना झूठ बोलता है,
गवाह जुबान से गूंगा निकला।
आईना चेहरा पढ़ता है, समझता नहीं है,
यही बात मैं दुनिया को समझाने निकला।

कल मस्जिद से जो मेरे साथ वाईज़ निकला
मेरी संगत का असर दुनिया पर ज्यादा निकला।

मुझे गिरना नहीं आता, मैं छलक जाता हूं,
बहका दिया किसी मयखाने से लड़खड़ाता निकला ।

       Master piece  (Insearch of peace)

I am your IDOL 
Dont preach me like 
Meagre Statue 

मैं जब छोटा होता था
सूरज मेरे पीछे होता था
आगे मेरा साया
बीच में मैं एक बच्चा सा।
मैं उस साये से खेलता था कभी 
पर उसे पकड़ने की कोशिश नहीं की।

अब मैं बड़ा हो गया हूं
और सूरज छोटा।
अब सूरज कहीं भी हो
बीच में मै एक अदना सा।
मैं उससे बचने की कोशिश
बहुत करता हूं पर
मेरा साया मेरे पीछे है
मेरे कर्म का पाखण्ड
मेरी करतूत सा।

उसके लेखे जोखे में
कभी चूक नहीं होती
जिनको साये सा पीछा
करते लगता हैं
उन्ही को नहीं मिलता
चिलचिलाती धूप में
कोई साया सुख की छॉव सा।

कद ऊंचा उस पेड़ सा
पछतावे पर लटका
पश्चाताप लगे खजूर सा।