किस्सा एक कबाड़ी का : समर सिंह की अमर कहानी

Kissa ek kabadi ka

                     किस्सा एक कबाड़ी का
समर सिंह की अमर कहानी हमारी मार्किट के मशहूर कबाड़ी वाले के लड़के का नाम समर सिहं था। ये बात उन दिनों की है जब हम स्कूल में पढ़ते थे। हमारी क्लास में समर सिहं नाम का लड़का पढ़ता था। पढ़ाई में एवरेज था लेकिन waste matrial से प्रॉजेक्ट बनाने में अव्वल था। शायद अपने पिता की विधा उसमें कूट-२ कर भरी हुई थी। बचपन में अक्सर देखा है कि अपने नाम से कोई मशहूर हो न हो पर अपनी छेड़ (निक-नेम) से मशहूर हो जाता है। उसको सब साथी कबाड़ी के नाम से ही जानते थे। और वो इसमें खुश रहता था।
मैने उससे पूछा भी की सब तुझे चिढ़ाते हैं पर तू चिड़ता नहीं है किस मिट्टी का बना है। उसने जवाब दिया कि कभी मोहल्ले में, स्कूल में किसी भी बच्चे बूढ़े जवान से पूछना ‘कबाड़ी’ कौन है। सब बता देंगे। कभी अपने असली नाम को पुछवाना बहुत कम लोग जानेगें अगर तुम एवरेज हो और अव्वल नहीं हो तो। और दूसरे पढ़े लिखो की तरह इसे सस्ती लोक प्रियता का नाम मत दे देना। ये आर्ट है। मुझे पानी में मछली तलना आता है। मैं अपने आप को ज्ञानी तो नहीं मानता हूं। लेकिन इतना समझता हूं कि एक पीएचडी मेरे घर पर सौ रूपये एक घण्टा के हिसाब से दिहाड़ी पर पढ़ाने आता है। पैसे में बहुत ताकत है।
मेरे बाप के पास पैसा बहुत है। ये जो मैने कहा कि पानी में मछली तलना मुझे आता है ये विधा मेरे बाप के पास है। और मैने भी ठान रक्खी है कि इस बिजनेस को आगे बढ़ाउंगा और एक दिन मैने मूत में मछली तलकर अपने बाप को नहीं दिखाया तो मेरा भी नाम ‘कबाड़ी’ नहीं। हॉ नहीं तो।
उस दिन मुझे महसूस हुआ कि अन्दर ही अन्दर ये ‘कबाड़ी’ नाम से कितना चिड़ता है। अन्दर कितना सुलग रहा है। और धन्य है ये समर सिंह जो इस आग से जल नहीं रहा है उसे कन्ट्रोल में रख कर अपने मकसद को पकाने में इस्तेमाल कर रहा है।
मैने उससे एक दिन पूछा कि आखिर इस धन्धे मे है क्या।बोला सच बता दूंगा तो शायद एक प्रतिद्वन्दी और पैदा हो जाए। फिर तीखी सी हंसी हंसने लगा।बोला सबसे बढ़ी बात इसमें कोई लागत नहीं है।अगर है तो बहुत थोड़ी। और बड़ी बात ये है कि जितनी बड़ी लागत उतना बड़ा व्यापारी।
दोस्त दो रुपया का दो सौ करने में दो महीना और
दो लाख का दो कराेड़ करने में एक महीना। पढ़े लिखों के सभी गणित फेल। एक छोटे से कमरे में कबाड़ भरकर फिर उसे बेचकर ये धन्धा शुरू किया था। हमें कोई शो रूम तो नहीं चाहिए था।
बस जगह चाहिए थी। दूर दराज में कौड़ियों के भाव जगह खरीदी ताकि जो कबाड़ खरीदे स्टोर कर सकें। आज वो जगह करोड़ो की है, कब कोई शहर के बीच में आ जाए पता नही।

बोला एक किस्सा सुनाता हूं। जब ये धन्धा परवान चड़ रहा था तो पहली दफा मेरे पिता मुझे साथ लेकर एक हवेली में कबाड़ की बोली लगाने के लिए साथ ले गये। वहॉ और भी कबाड़ी बोली लगाने आए हुए थे। सारा हवेली का समान सामने आंगन में display पर था। और बोली सारे सामान की एक लगनी थी। कम से कम बोली एक लाख से शुरू होनी थी। दस दस हजार से बोली बढ़ रही थी। दो लाख पर आकर कुछ थम गयी।
तभी अचानक मेरे पिता उठे और बोली तीन लाख बोल दी। मैने हाथ दबाकर बोला आप गलती तो नही कर रहे हैं। पलट के बोलै “नहीं”।
एक दो तीन और हथौड़े पर सारा सामान हमारा।

घर आकर पापा ने बताया जब भी बोली लगानी हो बस यही देखना है कि सामान का चरित्र कैसा है।

“मैं समझा नही”

बताता हूं। इस सारे सामान में सोफा सेट है डबल बैड है, म्युज़िक सिस्टम है, साईकिल है वगैरह वगैरह और एक पेन्टिग है। ये पेन्टिग अभी भी जिन्दा है। और मै जानता हूं ये पेन्टिग मेरी लागत है और बाकी मेरी प्रॉफिट है। अब मैं समझ गया। और वही पेन्टिग इलेक्शन के दिनों में एक मिनिस्टर ने खरीद ली मुंह मॉगे दामो पर। तो धन्धे का एबीसी इस तरह सीखा और प्रेरणा पाकर एक कम्पनी बनाई। जिसका नाम रखा ABCCorp .

अब मैं एक कम्पनी का मालिक हूं। और इसी तरह मै अब बड़े बडे़ ठेके उठाता हूं। राजनिती दरअसल बहुत बड़ा गारबेज है जहॉ कूढे़ की कमी नही है। सभी लोग राजनिती के बुरेपन से वाकिफ हैं लेकिन ये भी सच है कि बूरी राजनिती में अच्छे लोग भी हैं। और सौ लोग एक सच्चे को बार बार दोहराकर अपने जैसा झूठा बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

फिर मै टीवी पर न्यूज़ देखने लगता हूं। उसपर ये
खबर है कि आजकल अमर सिंह जी एक आक्कलन के अनुसार मुलायम सिंह जी और अखिलेश जी के बीच एक सांमजस्य बैठाने में सफल हो जाएंगे ।

तो सीख ये मिलती है कि जो commodity में deal करता है वो जानता है कि कबाड़ का अपना एक करैक्टर होता है जो संवेदनाओं से नहीं बदलता पर आदमी का बदलता है।

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