मुझमें मुमकिन है बहुत कुछ, खुशी मकाने-मालिक और गम किराएदार।


उनके हिस्से का नरक उन्हे क्यों नही मिलता,
मुझमे मुमकिन है बहुत कुछ,
खुशी मकाने-मालिक, गम किराएदार।
तुम्हे तो मालूम है तुम कॉटों पर सो लेते हो,
उन्हे मखमली गद्दों पर, निभाने हैं बिमारियों के किरदार।

हमारी बात मे स्टेटस सिम्बल का जिक्र रूटीन मेडीकल चैक अप से आता है,
तुम्हारे वैद्य की नब्ज़ पकड़ कर बिमारी बताना
उस अनुभव काे तुम्ही ने ठुकराया और किया तिरस्कार।

आज का विचार

​मित्रों आज मैं भगीरथ पैलेस गया था कुछ खरीद-दारी करने। मुझे लगा कि दुकानदार दुखी होंगे। 
और मुझे जानकर ये खुशी भी हुई कि भुरि भुरि प्रशंसा तो वो लोग भी कर रहे हैं जो बीजेपी के नहीं हैं। दुकानदार भी ये कह रहे हैं कि बैंक में परेशानी हो रही है वैसे धन्धे में उन्नीस बीस का ही फर्क है। बस एक बात का सरकार को ख्याल करना चाहिए कि ये जो इन्सपेक्टर राज है वो खत्म होना चाहिए।

अभी कल ही स्थानीय निकायों के परिणामों में भाजपा की जीत हुई अब विपक्ष चुप है। अभी कपिल सिब्बल जी ने कहा ये  डिमुद्रीकरण मुस्लमानो के खिलाफ हैं। यानी किसी भी बात को कोई भी एन्गल दे दो। सिब्बल साहब पेशे से वकील है और इस बात से उनके पक्ष/पैरवी करने के स्तर का पता चलता है। क्या पाकिस्तान में या दूसरे मुस्लिम देशों में लोग बैक मे एकाउंट नहीं रखते है क्या।

मै किसी पार्टी विशेष का पक्षधर नहीं हूं। या महज किसी पार्टी के पक्ष में इसलिए नहीं बोलता हूुं कि मेरा मन बना हुआ है। ठीक है तो ठीक गलत है तो गलत । पर समस्या ये है कि मेरे  या आपके विवेक को कौन परखेगा। 

स्वच्छ डेमोक्रेसी में सुदृड़ विपक्ष का होना बहुत ज़रूरी है । विपक्ष को समस्या इस बात से नहीं की डिमुद्रीकरण से जनता को समस्या या कठिनाइ हो रही है। पर विपदा ये है कि अगर मोदी जी की ये योजना सफल हो गयी और उ प्र में भाजपा इलेक्शन जीत गयी तो विपक्ष का पाटिया बिल्कुल साफ है। ये जो ममता जी मोदी जी को जड़ से उखाड़ ने की शपथ ग्रहण कर रहीं हैं ये बौखलाहट है। बदहवासी है। और ये कोई भी नहीं चाहेगा कि विपक्ष बिल्कुल ही खत्म हो जाए। क्योंकि विपक्ष कमजोर होगा तो डिक्टेटर शिप को बढ़ावा मिलेगा। एसा विपक्ष भी नहीं चाहिए जो मुसीबत में इतना बौखला जाए कि जाके पाकिस्तान से सहायता मॉगे और कहे कि मोदी को हटाओ। 

अब आगे अभी जिन लोगों के कालेधन की कब्र खुदी है अन्दर ही अन्दर उनकी आत्मा पर प्रेत हावी होने की कोशिश में ज़रूर होगा। हर अच्छे काम में ज्यादातर बुरे लोग गल्त तरीकों से फायदा उठाया चाहते हैं। और वो कुछ हद तक सफल भी होते हैं। ये एक तबका है जो किसी का  नहीं होता और गिरगिट की तरह होता है रंग एसा बदलता है कि वो उसी का हिस्सा लगता है।

और संकट के समय वो सही गलत नहीं देखता बस जहॉ फायदा दिखे उसका होता है।
संजय गॉधी ने मारुति लाने की जब कोशिश की तो विरोध हुआ। बाद में वही मारुति अब पूरी तरह छाई हुई है। परिवार नियोजन जब आया तो वही गुट जो सिर्फ लाभ देखता है पकड़ पकड़ कर लोगों की नसबन्दी करने लगा। नतीजा कॉग्रेस हारी लेकिन एक मैसेज गया कि परिवार छोटा होना चाहिए। वो लोगों तक पहुंचा। और आज कारगर भी है। अब यही बात जुड़ती है कि इस देश में दुसरा धर्म भी है। जहॉ शादीयॉ करो बच्चे करो खुदा की नेमत है। वहॉ उसमे समय के  साथ बेहतर बदलाव नहीं हुए। जेहाद जो धर्म की सुरक्षा के लिए था टेरर आंतकवाद के साथ जुड़ गया। 

पाकिस्तान का जन्म मुस्लिम लीग मुस्लमानो को अलग बसाने के ध्येय से हुआ। आज पाकिस्तान का हश्र सबके सामने है। वहॉ हिन्दु सन संतालिस में १५ से १७ प्रतिशत थे आज दो प्रतिशत भी मुश्किल से बचे है।

हिन्दुस्तान में  देश की बेहतरी के लिए एक लॉ होना चाहिए। धर्म देहलीज़ के अन्दर। सभी विकसित देशों में एसा ही है। वहॉ कानून सबके लिए एक ही है। हिन्दुस्तान में जो पाकिस्तान का झण्डा फहराते हैं पाकिस्तान में तो आप किसी भारतीय की प्रशंसा भी करो तो गोली मार दी जाती है। विडम्बना है।

मैं ये सब इसलिए भी बता रहा हूं कि मोदी हो सकता है अगले चुनाव में हार जाएं क्योंकि गलत पैसे में ताकत बहुत होती है। उसकी जड़े जरा सा पानी मिलने पर बहुत जल्दी बड़ती हैं। मुझे मुंशीप्रेम चन्द जी की पंक्तियॉ याद आती हैं कि

“मासिक आय तो पूरणमासी के चॉद सा है जो पहली तारीख को पूरा दिखता है और पन्द्रह (पक्ष) तारीख आते आते लुप्त हो जाता है। और उपरि आय तो एक बहता हुआ स्रोत है जिसे जितना बरतों उसमें उतनी बर्कत आती है”।
तो तात्पर्य यही है विवेक जगाइये, भक्ति तो अन्धी ही होती है पर राजनिती नहीं। 

पागल किसी को भी थप्पड़ जड़ देता है भरे बाजार,
पर अपने को कभी नहीं मारता, ये विवेक है या विचार।

आज का विचार: साथ में खट्टा आचार

मुझे एक पुराना पर सच्चा किस्सा याद आ रहा है। 

मेरा बेटा छोटा था तब। होगा कोई दो तीन साल का। इशारे समझता था हॉ को ऑ नही को नं कहता था। गोद में बैठाकर मै उसे कुछ सिखाने की कोशिश कर रहा था। उसकी अंगुली पकड़ कर मै अपने चेहरे पर ले जाता और नाक पर रखकर बोलता ये nosy है फिर होंठ पर रखता ये क्या है lips है फिर चीक्स, chin  वगैरह वगैरह। एसा कई बार बताया। फिर मै बोला “अब मैं पूछूं’

बेटा बोला “”अं” । 

मैने पूछा nosy कहां है उसने चेहरे पर अ़पनी अ़गुली रख दी।कहीं भी। कुछ भी पूछता eyes lips वो चेहरे पर अंगुली रख देता। यानी उसको ये समझ आ गया कि सारे सवालों के जवाब में ये एक चेहरा है उसपर बस अंगुली रखनी है।

 अब आगे दूसरे परिपेक्ष में इस कहानी को बढ़ाते हैं। 

अब यही बच्चा अगर राजनिती में opposition का हो तो क्या करिएगा। अब बच्चा तो बच्चा है।
नहीं मानता तो समझाएगे, वक्त रहते समझ भी जाएगा।  पर एक मॉ को सब्र नहीं हुआ। थप्पड़ मार दिया जैसे emergency लगा दी हो। आजकल कोर्ट भी सख्त हैं । जेल की सजा सुना दी। 

खिड़की खुली थी। नीचे से हवा में लहराता हुआ एक अखबार सीने पर आ गिरा। अब टविस्ट ये है कि मेरा सीना तो छप्पन इंच का नहीं। मेरी नींद खुल गई।

ऊपर वाले मकान से आवाज आ रही थी। एक हिन्दी का मास्टर बच्चे को अतिश्योक्ति और अभिदा व्यंजना का उदाहरण देकर समझा रहा था कि “सर पर चढ़े रहना” का मतलब ये नहीं होता कि कोई तुम्हारे सर पर चढ़ कर बैठ गया।

उसका मतलब होता है…………………..

खिड़की बन्द हो गई। आवाज आना बन्द हो गई।अब इसका मतलब भी मुझे ही समझाना पढ़ेगा। बच्चों की हिन्दी बहुत कमजोर है आजकल।

आज-कल के हालात पर एक तप्सरा,                                       मेरे मौहल्ले में आई एक नई अप्सरा।

​आज के सन्दर्भ में एक कहानी सुनाता हूं।

हमारे मोहल्ले में एक नई मोहतरमा (मैडम) किराए के मकान में रहने के लिए आईं। गज़ब  की खुबसूरत हैं। पढ़ी लिखी हैं। बात करने का ढंग सलीका सब बहुत सुन्दर है। यहॉ तक तो सब ठीक है। पर ज्यादा सर्वगुण सम्पन्न होना भी ठीक नहीं होता। नतीजतन सब यानी अधेड़ और जवानों का झुकाव उन्ही मैडम की तरफ है। 

अब परेशानी ये है कि वो खुद तो ठीक हैं पर ज़माना परेशानी में है। खासकर मोहल्ले की सभी औरतें ज्यादा परेशान है। 

ये मैडम जिस ऑफिस में काम करती हैं पॉच बजे छुट्टी हो जाती है और मैडम ठीक छ: बजे बस से सोसाइटी के गेट पर उतरती हैं। 

अब मोहल्ले के जो मर्द ऑफिस से देर से आते हैं

वो अब टाइम से घर लौटने लगें हैं। 

अब इस में अगर एसा सोचा जाए कि जो लोग अब किसी भी कारण से छह बजे लौट रहें हैं उसमे उस मैडम का क्या कसूर है। 

अब पूरे मोहल्ले में गूगल सर्च हो रहा है कहीं से कोई बात निकले या निकाली जाए। झूठी या सच्ची कुछ भी। अगर ज़रा सी भी हो तो उसे राई से पहाड़ बनाया जाए। जब कुछ भी हाथ नहीं लगा तो एक खुराफात ने मैडम की शक्ल और आव भाव एक तवायफ से मिला दिये।

बस 

फिर क्या था चैनलों ने तो उसके रिश्ते दार भी निकाल लिए। पता लगा वो पहले कभी बचपन में किसी के घर बर्तन मॉजती थी। और पता नही क्या क्या करती होगी। ढूंढो ढूंढो ढूंढो …….. इसको बिना बात के अपना मतलब सिद्ध करने के लिए बदनाम करना था तवायफ बना दिया। वो तवायफ बनी या नहीं बनी पर दलालो का पता मिलता है । 

उस मैडम ने किसी से कुछ लिया न किसी को कुछ कहा। बस वो सुन्दरता से बात करती है। कायदे से रहती है । और बला की अच्छाइयॉ उसमें हैं। अब उन सबको परेशानी है जिन्हे कोई देखता नहीं कोई पूछता नहीं। अौर इसी कोशिश मे अपनी सोने की अगूठी दिखाने के चक्कर में अपना घर फूंक रहें हैं।
मैं ये कहानी नहीं सुना रहा हूं। अपने मौहल्ले या  सोसाईटी की नहीं देश की हकीकत ब्यान कर रहा हूं। 

लाखों लुटेरे खत्म हुए कुछ एक बचे हैं

RTI में चिट्ठी डाली है जो बच गये अगर मेरी पार्टी के हैं तो कोई बात नहीं अगर विरोधी दल के हैं तो हम सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे । आखिर दम तक लड़ेंगे।
क्या विडम्बना है

गालिब का शेर याद आ रहा

गो हाथ को जुंबिश नहीं, ऑखों में तो दम है,
रहने दे अभी सागरो मीना मेरे आगे।

*बाज़ी-चाए-अतफाल है दुनिया मेरे आगे,
होता है शबो रोज़ तमाशा मेरे आगे।

*बाजींचाएअतफाल- बच्चों के खेलने का मैदान।

​गिरती हुई दीवार के नीचे यूं ही नहीं बैठा हूं, खुद को दफनाना है मुझे कर्ज़ा कौन देगा।

​गिरती हुई दीवार के नीचे यूं ही नहीं बैठा हूं,
खुद को दफनाना है मुझे कर्ज़ा कौन देगा।

इस ढलती उम्र में कॉधे पर हाथ रखकर,
वो तसल्ली तो दे रहा है, मुझे कॉधा कौन देगा।

जब जवान था कम पैसे में लम्बी उम्र का बीमा कराया मैने,
अब खाने की लागत ज्यादा है इस बुढ़ापे में जीने की औसत कौन देगा।

मुझे पता है मेरा अनुभव मुझे मार रहा है,
खुदा करे के ये झूठ हो, पर बच्चों की सही सोच का अन्दाजा़ कौन देगा।

जब भी मेरी बात का दूसरा मतलब निकलना अच्छा निकलना,
मेरे रकीबों से अच्छी उसकी निगरानी का हिसाब कौन देगा।

ये मेरे बीते हुए कल का दर्पण है।

This is The Mirror of my past
ये मेरे बीते हुए कल का दर्पण है।

गमों को ब्यान करने को छलकती निगाह दी है,

और खुशी का इज़हार करने को रोशनाई दी है।

सलीका बदल देता है रंग मेरी तरबियत का,

कमण्डल में शराब रखता हूं और साधु सी तबियत दी है।

मुझे ज़ख्मों से याद आया ये तेरी बाबत तो नहीं है, रकीबों की कोशिशे भी तुझे बरगलाने लग गई होंगी।


उसे आज मेरी अनदेखी बहुत नागवार गुजरी है,
उसे इल्म ही नहीं जिसके इन्तज़ार में हमने उम्र गुज़ार दी होगी।

बेमुरव्वत, खुद से पूछा किए वो नज़र की चूक थी
वोह जब गुज़रे तो ऑख बेइरादा लग गयी होगी।

*बेमुरव्वत- जिसे शर्म संकोच न हो

मुझे ज़ख्मों से याद आया ये तेरी बाबत तो नहीं है,
रकीबों की कोशिशे भी तुझे बरगलाने लग गई होंगी।