ख्वाहिशों के लड्डू

          ख्वाहिश का लड्डू

मुझे बचपन में मोतीचूर के लड्डू बहुत पसन्द थे।
कभी भी कोई भी त्यौहार हो पूजा हो और मुझे मिठाई लाने के लिए कहा जाता तो मैं दौड़कर मोतीचूर के लड्डू ही लेकर आता। 

मैं अब रिटायर हो चुका हूं और बैठे बैठे बचपन की बातें याद कर रहा था। ये ख्वाहिशे तब भी थी और ख्वाहिशे कद से ज्यादा हीं होती हैं। लेकिन बचपन की ख्वाहिशे बस इतनी की रोज़ की रोज़ पूरी हों कल के लिए जगह नहीं होती थी। मुझे अब भी याद है वो घर के पिछवाड़े तुलसी का पौधा जिसके नीचे पॉच का सिक्का गाड़ना इस उम्मीद से की एक दिन पेड़ उगेगा। उसमे पैसे लगेंगे। सुबह उठकर तुलसी के साथ उस नम जमीन को भी पानी देना जहॉ पैसे गाड़े थे। क्या दिन थे।
कल मेरा जन्म-दिन है। और जैसे कल ही की बात हो। यही याद करते करते कब ऑख लग गई। पता ही नही चला। ऑख लगी और खाब में वही तुलसी का पौधा अब बड़ा गया है। मैं साफ साफ देख रहा हूं उसी नम ज़मीन पर एक साधु बैठा है जहॉ कभी मैने तुलसी के पौधे की नींव रक्खी थी।

मुझे देख कर मुस्कराया। मैं वही बच्चा सा उस साधु के सामने बैठ गया। साधु बोला : मैं जहॉ बैठा हूं इस जगह से तुम्हे बहुत उम्मीदें थी। हैं न।
मै बोला “जी”। 
साधू “नि:संकोच कहो। मुझे मालूम है तुम्हे मोतीचूर के लड्डू बहूत पसन्द है। और मै ये भी जानता हूं कि तुम्हारे मन में क्या चल रहा है”। मैं बोला बाबा आप सब जानते ही हैं तो मैं क्या कहूं।

साधू बाबा बोले “हूं, तो चलो ये मोतीचूर का लड्डू लो, प्रसाद है। याद रहे जितने लड्डू में दाने उतनी ख्वाहिशे पूरी करेगा। एक दाना खाना एक इच्छा पूरी। पर ये बात भी ध्यान रहे कि जब दाना तोड़ो/निकालो तो लड्डू टूटना नहीं चाहिये।”
और खाब के साधू खाब में ही अन्तर्धयान हो गये यह गुनगुनाते  हुए कि

‘हर दाने पर एक ख्वाहिश और बिखरने न पाए,
बिना नोचे न निकले दाना, लड्डू टूटा जाए।’

और मन में ये लालच रह ही गया कि बाबा ने सब जान तो लिया और पूछा नहीं।

सुबह हुई। बेटे ने “हैप्पी बर्थ डे टू यू” कहकर उठाया। मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। और मुझे हैरत तब ज्यादा हुई जब मेरे बेटे ने मेरे हाथ में “चौलाई के कम मीठे वाले लड्डू का डब्बा मेरे हाथ में रख दिया “। जिसमे दाने तो अनगिनत और उम्मीद से ज्यादा थे पर इतने सूक्ष्म के एक दाने पर एक लड्डू टूटे ही टूटे। बाबा की कृपा से ख्वाहिशें तो पूरी हो गयी पर एहसान का उधार अब भी बाकी है।

मैं सोच रहा था पच्चीस हज़ार की पैंशन पर सारा परिवार चलता है और सुकुन है। मेरे बेटे की तनख्वाह मुझसे तिगुनी है। और दूसरी तरफ पिचहतर हज़ार दानों का चौलाई का लड्डू हर महीने बैंक में तो होता है हाथ में नहीं आता है।
एक बात तो अच्छी है उधार बाहर का बाहर किश्तो पर निबट जाता है। ख्वाहिशों के लड्डू जितने मुंह में नहीं आते उससे ज्यादा तो बिखर जाते हैं और बाज़ार में चर्चा है कि उनके कपड़ों  पर क्रीज़ हमेशा बरकरार रहती है।

Lust हमेशा अपने को कपड़े की creeze में ज़िन्दा रखती है।

स्कूल के दिनों में लड्डू फूटना जो एक मुहावरा है, का मतलब हर बार परीक्षा मे पूछा जाता था और उसे वाक्या में प्रयोग करना होता था। हर बार मैं यही लिखता था। इच्छा वो रक्खो जिसमें मन में भी लड्डू फूटे। आज सोचता हूं उस मुहावरे का प्रयाेग क्या वास्तव में मैं ठीक करता था क्या। 

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