ऐसी स्थिति कभी नहीं देखी, नोटबंदी के ख़िलाफ़ बोलने से लोगों को डर लग रहा है : रवीश कुमार

​ये जो लोग डरे हुए हैं क्यों डरे हुए हैं। जिनके पास काला धन हैं वो डरे हुए हैं। वरना बैंक में पैसा जमा करने को कौन मना कर रहा है । जितना मर्जी कराइए। 

रही गरीब की बात तकलीफ तो है। लाइन में दिहाड़ी खत्म हो रही है। ये तकलीफ उनको ज्यादा है जो घर में घड़े में पैसा रखते हैं। क्योकि जनधन में हज़ारों खाते एसे हैं जो खुले पर उनमें कोई रवानी नहीं थी। और अब भी लोग जिनके खाते हैं वो खाते में जमा न करवाके एक्सचेज करवा रहे हैं। ज्यादा भीड़ नोट बदलवा ने वालों की है न की खाते में जमा करवाने वालों की। और सारी समस्या यहीं है।

एक बात और अब न तो कोई किडनैपिंग की खबर है न कश्मीर में कोई पत्थर बाजी का समाचार है। और तो और डेंगू और चिकनगुनिया के समाचार भी बन्द है या यूं कहें कि वो खबर बिकनी बन्द है। 

हर आदमी जिन्दगी में कभी न कभी जुआ ज़रूर खेलता है। और यहॉ मोदी जी नें भी पचास दिन का दाव खेला है। अब देखिए एक शक्स ने जुआ खेला है और राजनैतिक गलियारों की सारी सम्तें उस एक आदमी को घेरने में लगी हैं लेकिन लगता ऐसा है कि खुद घिर गयें हैं।

मुझे एक किस्सा याद आ रहा है । एक आदमी के पेट में कीड़े हो गये। अब पेट एक और हज़ारों कीड़े। देश रूपी पेट को खा रहें हैं।बैद्य ने दवा दी और कहा दवा खाने से पहले थोड़ा. मीठा खा लेना। मैने कहा दवा से पहले मीठा क्यों? बोले मीठा खाने से ये होगा की पेट के कीड़े ढूंढने नहीं पड़ेगे। जैसे ही मीठा खाया सारे शरीर के कीड़े हर कोने से निकल कर इस मीठे पर टूट पडेंगे। फिर दवा खा लेना। सब वहीं खत्म। तब दवा की पुडिया अपना काम तो करेगी। मीठा आप खा चुके हैं। स्वस्थ तो आप तभी होंगे जब ये प्रक्रिया पूरी होगी।

एक चौकीदार को नींद आई। नींद में एक खाब आया कि कल मालिक के यहॉ चोरी होगी। दूसरे दिन सब चौकस और सच में ही चोर आया और उसे सबने मिलकर धर दबोचा। चोर पकड़ा गया। चोर को सजा हुई। अब सवाल है कि चौकीदार का क्या करें जो डयुटी पर सोता है पर सपने कमाल के देखता है रवीश कुमार जी। और विचार जब हकीकत के धरातल पर रखते हैं तो तकलीफ तो होती है। जिस भी बच्चे की मॉग ऱोने से पूरी हुई वो ही बड़ा होकर शार्ट-कट ढूंढता है। जुगाड़ शब्द वहीं से पैदा हुआ है।

अब मान लीजिए मैं एक पत्रकार हूं। मेरा एक मालिक है। अब मैं मालिक के कहे अनुसार चलूं तो स्वामी भक्त नहीं चलूं तो विभीष्ण । देश की सत्ता की तस्वीर खिंचू तो पता नहीं क्या क्या जैसे देश भक्त, राष्ट्-भक्त साम्प्रदायिक धर्मात्मा वगैरह वगैरह। और ये सारे इल्जाम खेमों मे बंटे हुए है जिन्हे देश हित से कोई लेना देना नहीं है।

तो यहॉ तो पी एम को नहीं जीने दिया जा रहा है। तो पत्रकार क्या चीज़, हम आप जुलियस सिज़र का एन्टोनी है क्या। ये सब तो आपके स्टाईल में होना चाहिए किसी मजबूरी में नहीं। कहने का मतलब चल निकले तो खबर नही तो मजबूरी को ये कहकर मत बचिए की उसका नाम तो महात्मा गांधी है।

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