आज-कल के हालात पर एक तप्सरा,                                       मेरे मौहल्ले में आई एक नई अप्सरा।

​आज के सन्दर्भ में एक कहानी सुनाता हूं।

हमारे मोहल्ले में एक नई मोहतरमा (मैडम) किराए के मकान में रहने के लिए आईं। गज़ब  की खुबसूरत हैं। पढ़ी लिखी हैं। बात करने का ढंग सलीका सब बहुत सुन्दर है। यहॉ तक तो सब ठीक है। पर ज्यादा सर्वगुण सम्पन्न होना भी ठीक नहीं होता। नतीजतन सब यानी अधेड़ और जवानों का झुकाव उन्ही मैडम की तरफ है। 

अब परेशानी ये है कि वो खुद तो ठीक हैं पर ज़माना परेशानी में है। खासकर मोहल्ले की सभी औरतें ज्यादा परेशान है। 

ये मैडम जिस ऑफिस में काम करती हैं पॉच बजे छुट्टी हो जाती है और मैडम ठीक छ: बजे बस से सोसाइटी के गेट पर उतरती हैं। 

अब मोहल्ले के जो मर्द ऑफिस से देर से आते हैं

वो अब टाइम से घर लौटने लगें हैं। 

अब इस में अगर एसा सोचा जाए कि जो लोग अब किसी भी कारण से छह बजे लौट रहें हैं उसमे उस मैडम का क्या कसूर है। 

अब पूरे मोहल्ले में गूगल सर्च हो रहा है कहीं से कोई बात निकले या निकाली जाए। झूठी या सच्ची कुछ भी। अगर ज़रा सी भी हो तो उसे राई से पहाड़ बनाया जाए। जब कुछ भी हाथ नहीं लगा तो एक खुराफात ने मैडम की शक्ल और आव भाव एक तवायफ से मिला दिये।

बस 

फिर क्या था चैनलों ने तो उसके रिश्ते दार भी निकाल लिए। पता लगा वो पहले कभी बचपन में किसी के घर बर्तन मॉजती थी। और पता नही क्या क्या करती होगी। ढूंढो ढूंढो ढूंढो …….. इसको बिना बात के अपना मतलब सिद्ध करने के लिए बदनाम करना था तवायफ बना दिया। वो तवायफ बनी या नहीं बनी पर दलालो का पता मिलता है । 

उस मैडम ने किसी से कुछ लिया न किसी को कुछ कहा। बस वो सुन्दरता से बात करती है। कायदे से रहती है । और बला की अच्छाइयॉ उसमें हैं। अब उन सबको परेशानी है जिन्हे कोई देखता नहीं कोई पूछता नहीं। अौर इसी कोशिश मे अपनी सोने की अगूठी दिखाने के चक्कर में अपना घर फूंक रहें हैं।
मैं ये कहानी नहीं सुना रहा हूं। अपने मौहल्ले या  सोसाईटी की नहीं देश की हकीकत ब्यान कर रहा हूं। 

लाखों लुटेरे खत्म हुए कुछ एक बचे हैं

RTI में चिट्ठी डाली है जो बच गये अगर मेरी पार्टी के हैं तो कोई बात नहीं अगर विरोधी दल के हैं तो हम सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे । आखिर दम तक लड़ेंगे।
क्या विडम्बना है

गालिब का शेर याद आ रहा

गो हाथ को जुंबिश नहीं, ऑखों में तो दम है,
रहने दे अभी सागरो मीना मेरे आगे।

*बाज़ी-चाए-अतफाल है दुनिया मेरे आगे,
होता है शबो रोज़ तमाशा मेरे आगे।

*बाजींचाएअतफाल- बच्चों के खेलने का मैदान।

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