आज का विचार: साथ में खट्टा आचार

मुझे एक पुराना पर सच्चा किस्सा याद आ रहा है। 

मेरा बेटा छोटा था तब। होगा कोई दो तीन साल का। इशारे समझता था हॉ को ऑ नही को नं कहता था। गोद में बैठाकर मै उसे कुछ सिखाने की कोशिश कर रहा था। उसकी अंगुली पकड़ कर मै अपने चेहरे पर ले जाता और नाक पर रखकर बोलता ये nosy है फिर होंठ पर रखता ये क्या है lips है फिर चीक्स, chin  वगैरह वगैरह। एसा कई बार बताया। फिर मै बोला “अब मैं पूछूं’

बेटा बोला “”अं” । 

मैने पूछा nosy कहां है उसने चेहरे पर अ़पनी अ़गुली रख दी।कहीं भी। कुछ भी पूछता eyes lips वो चेहरे पर अंगुली रख देता। यानी उसको ये समझ आ गया कि सारे सवालों के जवाब में ये एक चेहरा है उसपर बस अंगुली रखनी है।

 अब आगे दूसरे परिपेक्ष में इस कहानी को बढ़ाते हैं। 

अब यही बच्चा अगर राजनिती में opposition का हो तो क्या करिएगा। अब बच्चा तो बच्चा है।
नहीं मानता तो समझाएगे, वक्त रहते समझ भी जाएगा।  पर एक मॉ को सब्र नहीं हुआ। थप्पड़ मार दिया जैसे emergency लगा दी हो। आजकल कोर्ट भी सख्त हैं । जेल की सजा सुना दी। 

खिड़की खुली थी। नीचे से हवा में लहराता हुआ एक अखबार सीने पर आ गिरा। अब टविस्ट ये है कि मेरा सीना तो छप्पन इंच का नहीं। मेरी नींद खुल गई।

ऊपर वाले मकान से आवाज आ रही थी। एक हिन्दी का मास्टर बच्चे को अतिश्योक्ति और अभिदा व्यंजना का उदाहरण देकर समझा रहा था कि “सर पर चढ़े रहना” का मतलब ये नहीं होता कि कोई तुम्हारे सर पर चढ़ कर बैठ गया।

उसका मतलब होता है…………………..

खिड़की बन्द हो गई। आवाज आना बन्द हो गई।अब इसका मतलब भी मुझे ही समझाना पढ़ेगा। बच्चों की हिन्दी बहुत कमजोर है आजकल।

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