नव वर्ष मंगलमय हो।                       Happy New Year to you & all near and dear

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Happy new year Word Press family
R K Dogra

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Happy New Year to all word press friends

​पुराने वर्ष परः एक विचार

आफताब की साफगोई तो उजाले में  है,
ये अँधेरा ही है जो चाँद से बदमाशियां करता है.
सुनते हैं संगत में लोग बदल जाते हैं 
कौन किसको बदलता है ये मीडिया बताता है.

कैसे बीता  वर्ष पुराना एहतियातन 
बुराई रही खूब उजागर सच पूरातन . एहतियातन।

कालाबाज़ारु चुप रहे गुर्गे बोलत जाहिं 
जो दब गए वो दफ्न तन दफतन, टन्न तनातन, एहतियातन।

गुजरात सा एक और गांव जला,
क्यों बंगाल में हो गया कंगाल आ-रक्षण, सन्न सनासन
एहतियातन।

कोई ‘कुमार’ न बोला उसपर, झोला लेकर,
सांप सूंघ गया उनको ततक्षण, ओ कुलच्छन 
एहतियातन।

To you it’s a school tie.       To a bullied child it’s a way out.

खेल ही खेल में वो दो शब्द प्यार के क्या बोल गया ,
एक रुक हुआ सैलाब था आँखों से छलक गया।

वो गिरा इधर उधर देखा जायज़ा लिया सब ठीक था 
कोई पुचकारता तो अभी मैं रो देता, अब भी मेरा बचपना नही गया।

A drunkard (husband) with wisdom.   

(समुन्द्र के किनारे पर टहलते-२  एक शख्स पर नज़र पड़ी. नशे में लेटा पड़ा था. मैंने उसे हिलाया वो उठा फिर लेट गया उसने देखा चारों तरफ . सूरज अधर में था. वो मुझसे पूछता है सुबह है की रात होने को है जैसे पूछ रहा हो कि 
“आरती का समय है या ग़ज़ल होने को है )

सुबह है कि शाम ऑख मलते हुए जब अधर मे आफताब देखता हूं,
बड़ी इन्तजार के बाद बमुश्किल फैसले पर पहुंचता हूं।

सब्र का फल मीठा होता है और उस सब्र को तौबा  का सलाम 
उसकी भी एक दिन शाम होगी रात बारह बजे जब मै पिके घर पहुँचता हूँ.

मैं पिके देवता हो जाता हूँ, उसको ये कहके क्या मिलता होगा,
सजदा वो रोज़ करती है सलामती का,मै ही  घर देर से पहुँचता हूँ.

​तन्हाई तो फितरती बेचैन है, चुपचाप बैठने तो नहीं देगी,.                   क्या भरोसा, मेरी मंज़िल को गलत पता देकर कहीं भटका तो नहीं देगी।

​तन्हाई तो फितरती बेचैन है, चुपचाप बैठने तो नहीं देगी
क्या भरोसा मेरी मंज़िल को गलत पता देकर कहीं भटका तो नहीं देगी।

सफर का तो पता नहीं, पर सॉसें जब थमेगी,
क्या उम्मीद भी, आखिरी दम तक आसरा नहीं देगी।

तसल्ली उस किनारे मौत से हाथ मिलाने लगी है
वो ज़िन्दगी को कहीं पानी में मिला तो नहीं देगी।

मौत का ज़िन्दगी में   बस एक ही मसला है
मौत हिस्सा तो पूरा देती है,पर बचने का फार्मूला नहीं देगी।

इतनी गलतफहमियों में मौत से कहॉ मरता है आदमी,
ये ज़िन्दगी ही है जो आसानी से उसे जीने नहीं देगी।

“उजड़ जाए न ये प्रकृति, उस पेड़ की तरह, बैठक में सजा हो ठूंठ बाेन्साई की तरह।”

सृष्टि जीवन पर्यन्त का पर्यावरण,
पराया आवरण सा क्यों लगता है।

यही एक आचरण है,
एक कदम टिकता है
तो दूसरा लॉघता है।
ये क्रम अपने कर्म में
मुक्ति खोजता है
जीवन बॉटता है।

“उजड़ जाए न ये प्रकृति, उस पेड़ की तरह,
बैठक में सजा हो ठूंठ बाेन्साई की तरह।”

Sun unsettled behind the curtain

सुना है इन्तज़ार मे, मेरे चले जाने के बाद,डूबने से पहले,
उस पार उफ्फक के, उसे सारी कायनात शिकायत सी लगती है।

उसके सीधे सपाट तपाक से खुले होकर बेबाक मिलन के तरीके,
दूसरे इन तरीकों को तरतीब से चिलमन सा हटाकर,फिर नज़ाकत से सफर तय करना, तयशुदा* सी लगती है।

तयशुदा – settled