तौर तरीके बदलने लगे हैं तहज़ीब के तकरीर के,कौवे बेहतर होने लगे है, टीवी पर देखा! बोला ही नही।

लुका छिपी से आगे ज़िन्दगी बढ़ी ही नहीं,
अब ऑखों पर पट्टी है, बचपना गया ही नहीं।

बहारों से पूछती मिलती रही तबियत हमारी,
लाख बदली सूरतेहाल, चेहरे से अनमना गया ही नहीं।

अनमना-बेपरवाह 

वो रोज़ गली से निकले मुस्करा बहला के चल दे,
बच्चों की तरह,हमारे हाथों से झुनझुना छुटा ही नहीं।

मैने वो लोग भी शिखर पर देखे हैं जिनका बचपन,
चारपाइ के पाये बंधा था, आज आसमानों की सुनता ही नहीं।

बड़ी दहश्त बरपा है उसके नाम की इलाके में,
अब किसी बुज़ुर्ग को बैठक में खॉसते सुना ही नहीं।

तौर तरीके बदलने लगे हैं तहज़ीब के तकरीर के,
कौवे बेहतर होने लगे है, टीवी पर देखा बोला ही नही।

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