आजकल राह में मुझे पत्थर बहुत मिलते है, अब ये रक़ीब हैं कि खुदा है पता नही चलता.

​रोने का मज़ा जो बरसात में है मत पूछ,
बादल रुकता भी है तो पता नही चलता. 

बरसात के मौसम में गम तो बिखर के तैरने लगे,
बारिश में कितनी शराब डूबी पता नही चलता.

वो बड़े दिन बाद दिखा तो जी भरके रोया,
वो आंसू ख़ुशी के थे या गम के पता नही चलता.

आजकल राह में मुझे पत्थर बहुत मिलते है,
अब ये रक़ीब हैं कि खुदा है पता नही चलता.

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An artist outlined the Gandhi within a perfect sketch. 

बड़ी मुश्किल से समझ आये तुम 
इतनी सरलता भी अच्छी नही ज़माने में.

बात मुश्किल सी जब कोई आसानी से झल लेता है,
इतना सस्ता होना भी आजकल असम्भव है ज़माने में.

तेरी सोहबतों पर इलज़ाम था, ज़माने से लड़ गया था मैं,                       कि तू जब से छोड़ के गया है शराब पीने लगा हूँ मैं ।

तेरी सोहबतों पर इलज़ाम था, ज़माने से लड़ गया था मैं,
तू जब से छोड़ के गया है लोग कहते हैं शराब पीने लगा हूँ मैं ।

शौक और आदत में फ़र्क़, बरगलाने लगी है लत,
बोली अंधेरे साम्राज्य में दिया सा जलाने लगी हूँ मैं ।

समर्पित है बिहार के उस दशरथ”मांझी” को जिसने छैनी लिए हाथों में पहाड़ को मिट्टी कर दिया।

ये मैने क्या कर दिया, अनजान था,
गम को दूर किसी वीराने में छोड़ आया था।
घुन के साथ गेहूँ भी चला गया शायद
क्या सचमें नेकियां भी उस कुएं मे डाल आया था।

अब खुशियां घर में अकेली मारी मारी फिर रही होंगी शायद,
मुझे डर सता रहा है कि मैंने जब घर छोड़ा था तो शराब भी छोड़ आया था।

शौक और आदत में फर्क एक दिन लत समझाने लगी मुझे,
कि लत तो बुरी तरह अच्छी पीछे पड़ी है तू जिसे बड़े शौक से छोड़ आया था।

वो उसके गांव से शहर के बीच एक पहाड़ था अड़चन
गम का बारूद पहाड़ में सुरंग कर गया, मांझी सही था जो खुशी घर छोड़ आया था।

आंख भर देख लेते हैं तसल्ली कर लेते हैं,हमारा जी भर जाता है तेरा क्या ले लेते हैं।

पूर्णमासी में घूंघट में चांद पूरा न, हो सकता है आधा दिखाई दे,
मेरी खिड़की से ज़रुरी नहीं कि चांद तेरी खिड़की में जैसा दिखता है वैसा ही दिखाई दे।

वो एक इशारा करके छुप गया मन दिल को बधाई दे,
उसके वादे का पूरा सच यकीं ही तो है, आधा तसल्ली में आधा इंतज़ार में दिखाई दे.

वो जो आग लगी थी घर के किसी चिराग से,किताब का रौशनी से साबिका*, सबक को कोई खिताब भी दे।


मै चिराग हूं  रौशनी मेरी मलकियत है,
मुझे थोड़ी सी हवा भी लगे, तो झूजने का हौंसला भी दे।

डग-मग कदमों से जब पहली दफा चला था मैं,
मॉ की खुशी को ठिकाना, मुझे थोड़ी सी दिशा भी दे।

क्या क्या खाब देखे थे, एक ज़िन्दगी का भी था,
जिसे नींदो ने उड़ाया है, उसे ज़मीन पर कोई ठिकाना भी दे।

वो जो आग लगी थी घर के किसी चिराग से,
किताब का रौशनी से साबिका*, सबक को कोई खिताब भी दे।

एक एक ग्यारह हो या दो, ये ताकतों का हिसाब है,
मुझे उस गुरू से मिला भी दे जो ठोकरों का सिला भी दे।

साबिका या साबका= सम्बन्ध या वास्ता

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किनारा इधर का उधर हो गया, इस बार चांद अजनबी हो गया।      

At Rekhta

इस बार चांद अजनबी हो गया

किनारा इधर का उधर हो गया।

चांद पानी में था और अक्स आसमां पर,

मारे खुशी के जब मैं रूआंसा हो गया।

मेरी गहराइयाँ नापने चला था वो,

आसमान भी कहीं किनारे हो गया ।