बस एक हाशिए* पर मैने शक्ल रखदी, वरना उस कोरे कागज़ पर न जाने क्या सूरतें होती। *Outline

Holi Mubarak
मुद्दत बाद इस बार होली पर उनके अचानक आ जाने से,
गिने नहीं गये चेहरे पर इक रंग जाता था दूसरा आता था।

गालिब ये कह गये मुझे बस याद आता है
“अब तो न जाने होली कब होती है,
पहले तो फाल्गुन में हुआ करती थी।”
हाथों से रंग हो आता जाता था,
हथेली मे तेरी सूरत जब आईना हुआ करती थी।

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