मयखाना:                                   एक धुरी काफी है घूमने-घुमाने के लिए वरना दुनिया कितनी  बड़ी है।                       फासला बस इतना है घर से मयखाना, पता है,             मयखाने से घर  तक का रास्ता नहीं मिलता।

मयखाना सीरीज : एक और किश्त 

किस किस को हम सबब* के मायने समझाएं 
बेरुखी, बेवफा तू नहीं क्या तेरे बिना बेवजह बेसबब हो जाएँ.

सबब *cause 

बेसबब uncaused बेवजह 

ज़िन्दगी तुझे अब ये  धड़कन की आवाज भी कचोटने लगी  है,
कानो पर हाथ भी धर लिए अब तौबा के बाद किधर जाएँ.

ये रास्ता है ये सड़क है वो सफर रहा,
बहुत वक़्त है सामने मंज़िल है भटकना भी तो है बता किधर जाएँ.

…………….

वो कई दिनों से मुझे जलाने की सोच रहा था, 
उसके अंदर का रावण दशहरे में कहीं छिप रहा था .

रक़ीब के जरिये वो  एक साज़िश  रच  रहा था,
ए राम तुझे कोई बनवास भेजने की चाल चल रहा था.

…………..

मुद्दत बाद इस बार होली पर उनके अचानक आ जाने से,
गिने नहीं गये चेहरे,पर इक रंग जाता था दूसरा आता था।

गालिब ये कह गये मुझे बस याद आता है
“अब तो न जाने होली कब होती है,
पहले तो फाल्गुन में हुआ करती थी।”

हाथों से रंग हो आता था हथेलियां रह जाती थी,
हथेलियां  तेरी सुरतेआईना तकती रह जाती थी।

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