जो जीतता है वो अपने रंग में रंगना चाहता है। लोकतन्त्र में हारने वाला अपना रंग छोड़ता नही है विलय के बाद भी बरकरार रहता है।

केसरी पहनना साम्प्रदायिक होना नही है.
चश्मा अगर राजनीती का  हो तो उसके हर रंग से नेता को समस्या  है. जबकि ये दीगर है कि सफेद कुरता पायजामा पहने कोई निकले तो नेता शब्द व्यंग बनकर ही मुख से निकलता है।

एक बार एक नेता ने छतरियां खरीदी बाँटने के लिए.मल्टी कलर की छतरी थी. उसमे सब रंग थे.
नीला काला भूरा  पीला. केसरी और हरा भी. पहली ही बरसात में छतरी चूने लगी. चलो होता है . कपडा है फट गया होगा दरअसल उनमे छेद हो गए. यहां तक तो ठीक था. और coincidence ये था की सभी छतरियों में जो छेद हुए वो केसरी रंग को छोड़ कर बाकि की सभी रंग की टल्लियों (कपड़े के patches) में से रिसाव था।
EVM machine की तरह की छतरी में गड़बड़ी होने की शंका की तरह इसको भी राजनैतिक पार्टीयां अमली जामा पहनाने से नहीं चूकी।

संसद में प्रश्न उठ गया कि केवल केसरी रंग की टल्ली patch ही बेहतर क़्वालिटी की क्यों लगी उसमे छेद क्यों नही हुआ. ये पार्टी साम्प्रदायिक है. दूसरे रंग को नीचा दिखाना चाहती है.
सुना है एक FIR इन्द्र देव के खिलाफ भी हुई है झुमरी तलैया से.
अब ये खोज जा रहा है की इन्द्र देव किसके कार्यकाल में ये धरती छोड़कर भागे. 

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One thought on “जो जीतता है वो अपने रंग में रंगना चाहता है। लोकतन्त्र में हारने वाला अपना रंग छोड़ता नही है विलय के बाद भी बरकरार रहता है।

  1. हाहाहा क्या रंग चढ़ाया है अपने । आनंद आया व्यंग्य और कटाक्ष पढ़कर । साधुवाद आपको

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