मैं जिस दिन न सवरूं, आईना मेरी किसी गैर सी हाजिरी दर्ज करता है।

हमने तो खाब में कभी उसका भी बुरा न सोचा 
जब कोई मेरी अच्छाइयों को सरे बाजार लूट लेता है।

वो लोग गुलों पर मर मिटे हैं जैसे किसी क्षणभंगुर
ने,
जैसे किसी अच्छी भली शान्त जिन्दगी को एक अट्टाहस लूट लेता है।

वो जो मेरे घर में मेरे जैसा एक और रहता है
सज संवरकर तब निकलता है पहले आईना उसे लूट लेता है।

घण्टों समझाने के बाद, बहुत देर तक लटों से उलझा रहा 
गिरना तय है उसका पेशानी पर, जिस अदा के साथ ज़माना उठा लेता है।

पेशानी – माथा

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