मुझे intolerant कहना इसी फतवे का हिस्सा है

एक गज़ल को जब बर्दाश्त न हुआ तो वो शेर शेर
रोई,
दो हिस्सों म़े बंटी, अब दोनो जहाँ रोता है क्या।

हिन्दू तो हिन्दोस्तान का है, सहनशील है उग्र है जाएगा कहां,
मेरे सब्र का बांध, आखिर मुझे ही कातिल ठहराएगा क्या।

“*दोस्त गमखारी में मेरी सही फरमावेंगे क्या,
ज़ख्म के भरने तलक नाखून न बढ़ जावेंगे क्या।”गालिब*”

दुनिया में दोस्ती भाईचारे के मायने अब आप हमें सिखलाएंगे,
सर्वधर्म समभाव हमारी सोच है अब आप समझावेंगे क्या?

हमने दुनिया को अमनो-चैन के सबक सिखलाए बहुत,
अब वो चले हैं हमको समझाने,तो समझावेंगे क्या।

पेड़ पर लगी *अमर बेल भी अब समझने लगी है शायद,
दरख्त ही जब न रहेगा, वो पाक धरती पर रह पाएगी क्या।

*अमरबेल -पेड़ पर लगती है

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