मैं अगर कुछ न बोलूं तो ये न समझना कि  मुझे लाजवाब कर दिया है,
चुप रहने के इन्तिखाब* चुपके से दिखाएंगे तुम्हे हमने खुद्दारी से बोल दिया है।

सुना है ज़हर पीकर कोई अमर हो गया है,
किस कमज़र्फ ने ‘अमृत’ का बाज़ार गिरा दिया है।

*पटवारी के पास रहने वाले (विशेषकर किसान आदि के) खाते की नकल या प्रतिलिपि जिसमें यह लिखा रहता है कि किस सन् में किस खेत का मालिक कौन था और उसने कितना जोता-बोया था

There is a lot of difference between  black and white in black and white.

मेरे पास एक कोरा काग़ज था। और मैं चाहता था कि लिखकर कुछ ब्यान करूं।कुछ समझाऊं। लेकिन दिक्कत ये थी के वो जिसे समझाना था वो सिर्फ सफेद अक्षर ही पढ़ पाता था। स्याह अक्षरों को काला अक्षर मानता था।

मुझे ये करने के लिए सारी किताब काली करनी पड़ी। कई रातें काली की। तब जाके 
सफेद अक्षर उकेरे हैं मैने।

और वो गरीब सब समझ चुका है।

दिया भी समझ चुका है कि उसे अगर चमकना है अन्धेरा चुनना पड़ेगा। स्वेच्छा से मजबूरी से नहीं।

साठ सालों जिस मजबूरी को सत्ता भुनाती रही उसी गरीब ने उन नशे में चूर राजनीतिग्यो को धूल चटा दी है।

क्या काला अक्षर भैंस बराबर ही होता है?

मैने रातें ऐसे ही काली नहीं की हैं, का मतलब क्या होता है।

कश्मीर के बारे में कहा गया है, “गर फिरदौस बर रूये ज़मी अस्त/ हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त” (धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, यही हैं).

जन्नत का रास्ता खुदा ने, जिन्दा की पहुँच से बाहर बना रक्खा है,
इस बात को समझाने की खातिर भारत में एक कश्मीर बना रक्खा है 

वो कितनी बार मरता है मरने के बाद फिर मरता है,
ये आशिक का कलेजा है, तुमने मज़ाक बना रक्खा है।

सूरत देखी, सीरत परखी। चाल चल गये, चलन दबाए बैठे हैं।।

बुरा तो वो भी बहुत है मेरा दुश्मन मेरी तरह,
फ़र्क़ ये है कि दोनों आईना जुदा लिए बैठे हैं 

बड़ा खुदगर्ज़ बेमुरव्वत* जालिम है ये ज़माना,
खूबसूरती पर मरते हैं और नक़ाब की दुकान  किये बैठे है.
बेमुरव्वत * अवसरवादी 

ईन्सान की खामोशी का मतलब है कि वो समझ चुका है, अब बस बहस रह गई है खुदा सुन चुका है।

आज का विचारः मैं कभी कभी सोचता हूं कि मेरी अपनी एक ऐसी अदालत हो। जिसकी  ढयोडी में कोई फरियादी जैसे ही कदम रक्खे वो न हिन्दू रहे  न मुस्लमान, न सिख रहे न ईसाई बस एक आदमी हो, इन्सान हो या इन्सान बनने की चाहत रक्खता हो।
अगर एसा हो तो शायद फैसले की ज़रुरत  भी यदा-कदा ही पड़े।

जहां भी बीच में धर्म आ गया,
सियासत कूद पड़ी पहले, खुदा किनारे हो गया।

अगर अल्लाह एक है तो कविता में खुदा लिखूँ,
ग़ज़ल में भगवान लिखते ही कहां तर्जुमा काफिर हो गया.

भीड़ से निकल, एकान्त किस लिए है हम तभी एक होंगे, अकेले अकेले।

बड़े खुदगर्ज़ हो मियाँ,
अकेले अकेले।

उसे भगाकर तन्हाई लूट रहे हो,
अकेले अकेले।

थे तो ग्यारह, ऐंठ मार गई मियाँ,
अकेले अकेले।

एक ही चना है पर आँख फोड़ सकता है
अकेले अकेले।

पटरी बैठा लो, गाड़ी सर्र जाएगी,
अकेले अकेले।

भीड़ से निकल, एकान्त किस लिए है,
हम तभी एक होंगे, अकेले अकेले।

हमारी खुशी का ठिकाना नहीं रहा बस बात हो गयी,                       कोई समझाए उन्हे ये मुहावरा नहीं है।

ये हरकतें तुम्हारे जूनून की जिस्मानी नहीं हैं
गो पैराहन हवा ले गयी है पर हम नंगे नहीं है।

गमों से इतने घिर गये तो उसने हमारी बात का अन्दाज़ा गलत लगाया,
हम जब नशे में कह गये कि हमारी खुशी का कोई ठिकाना नहीं है ।