मौसम का एक मिज़ाज़ होता है समझ लो तुम भी,                       ऋतु के तरह बदलते तो कहते मौसम अच्छा था.

बिजली नहीं देखती ये मकाँ किसका था,
हम बहस न करते तो अच्छा था।

गुस्से में सारे बाल और उलझा लिए तुमने,
उस वक़्त गर मैं कंघी न देता तो अच्छा था ।

ज़माने को हराकर मैने पाया था तुम्हें,
ज़िद कब छोड़नी है समझ लेते तो अच्छा था।

मौसम भी अपने हिसाब से पत्ते चलता है,
पतझड़ में सारे पत्ते डाल-२ के हार जाते तो अच्छा था।

मौसम का अपना मिज़ाज़ होता है समझ लो तुम भी,
ऋतु के तरह गर बदलते तो कहते मौसम अच्छा था.

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