On Father’s Day

 to myself

And remembering the Father’s Day

कभी खुद से बात की है, 

कर ना ज़रा?

आईने को मौका दे,

उसे बोलने दे न ज़रा?

पिता के सामने हम बोलते क्यों न थे,

समझने दे न ज़रा।

समय बदला है जगह भी बदली है,

तंग कपड़े पहनने का फैशन है,

शरीर को

adjust करने दे न ज़रा।
सर ढक कर चल

नूर का आदर कर,

हिदायत को बन्दिश न समझ।

लाठी न पकड़

कार से मैं बेकार हो जाऊंगा

मुझे पैदल चलने दे न ज़रा।
कभी खुद से बात की है……..
कभी खुद से बात की है……..

ये घड़ी मेरे पीछे चल रही है

दिवार पर है

अब लग रहा है मेरे पीछे पड़ी है।

अपनी खिड़की से नीचे

अपने मजनूं को

जैसे लैला देख रही है।

तू भी ऊपर देख न ज़रा

क्या कयामत लग रही है।
कभी खुद से बातकर

आज रूह को बोलने दे ज़रा……..

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2 thoughts on “On Father’s Day

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