उस Punch line की खातिर कहानी अधर में है, उसके अधरों का एक सच अधर* में लटका रह गया।

सुबह जिमखाने में शाम शराब खाने में,
कितना मज़ा है बचपने से हार  जाने में।

इसे ही लड़खड़ाना कहते हैं शायद जब 
शाम एक कदम रखता हूं घर की तरफ दूसरा चलता है   शराब खाने में ।

इश्क़ की हर गली का यूँ तो पता है मुझे,
तब तक भटकना तेरी गली में, एक दीदार का मज़ा वसूल पाने में।

मेरी आँख पर पट्टी बांधकर वो तो छूता है छिप जाता है
और हम खाली हाथ रह गये तेरी इस आँख-मिचौली में।

इस नींद को पुरानी आदत जो है तेरे दीदार की ,
आजकल देर हो जाती है उसे ज़हन से आँख तक आने में।

पीठ पर वो एहसास बाकी है, तेरी जीत और मेरी जान में जान आने  का,
वो तेरे हाथों से जानबूझ कर पीठ पर ‘धप्पा’खाने में।

*अधर Means lips and or in the middle

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