मैं जब बिछ गया उसकी गली में,       मेरी आवभगत में सिर्फ रकीब ने मुझे बिखरा हुआ पाया।

When people start reacting 
Like a seed one day they blossom by responding

प्यार प्यार होता है 
उसकी व्याख्या नहीं हो सकती 
शब्द चापलूसी करने लगते हैं।

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विचार फिर भी उभरेंगें, कूची फेर कर देख ले चाहे।   स्लेट काली है ही इसलिए, स्लेटी से पूछ ले चाहे।।

मैं कविता सिखाता हूं 
जी हां मै कविता सिखाता हैं।

बच्चा गर कोई गिर जाए तो उस पल को अनदेखा कर देना,
ये प्यार ही है जिसको पुचकार कर रोना सिखाता हूं।

मैं कविता….

हुबहू याद है शब्द दर शब्द बिछड़ना तेरा,
मैं गुज़रा हुआ हर वो महीन लम्हा पकड़ना सिखाता हूं।

मै कविता…

एक एल्बम सा कैसे लपेटना है अतीत को बिस्तर पर,
किस तह फूल रखने हैं किस करवट कांटे, सहेजना सिखाता हूं

मै कविता…

शयन कक्ष की उस कुर्सी पर आँख मूंदकर बैठना कभी,
ध्यान की किरण से जब अंकुर फुटे, उन्हे नम आँखो से सींचना सिखाता हूं।

जी हाँ मै कविता सिखाता हूं…

कुछ दिन बाद कुछ सालों में एक नज्म उभरेगी,
बच्चे तू शेर बन ये कहते कहते गज़ल करना सिखाता हूं।

क्या सच में कविता सिखाई जा सकती है,
हवा महसूस होती हुई दिखाई जा सकती है
बेहतर है ज़माने की खाक छानकर लाना, चुटकी में खाक को गुल* करना सिखाता हूं।

जी हाँ मैं कविता सिखाता हूं….

गुल- फूल, गायब करना।

​All Netas should come under product act 

All Netas should come under product act 
राजनीती भी अजीब खेल है. थोड़ा सा पार्टी चंदा लेने में तकलीफ हो रही थी तो पक्ष विपक्ष एक हो गए विधेयक पारित हो गया. मतलब वो विधेयक आसानी से पारित नहीं हो सकता जिसका क्रेडिट आपको  अकेले ही मिल रहा हो. 

जैसे MLAs की सैलरी बढ़ानी हो एक बैठक में पारित. बैंक की हो तो अगले सेटलमेंट तक पारित हो जाये तो गंगा नहाये समझना. उन्हें कमजोरी पता है कहेंगे हर बैंक/पार्टी अपना-२ प्रपोजल लाये. तो ऐसे एक बार राजनैतिक पार्टयों को ऑप्शन दे फिर देखते हैं कैसे एक बैठक में  बिल पारित होता है.
पालिसी है डिवाईड एंड रूल.
पर लीडर किसी यूनियन का हो या राजनैतिक पार्टी का कभी घाटे में नहीं रहता.

(Its a proven fact चंदा घटाओं सा बरसा है तो घोटाला है) 

अब कभी कभी सोचता हूँ चुनाव आयोग से सिफारिश करूँ कि हर नेता या पार्टी एक 
प्रोडक्ट एक्ट के अंदर आना चाहिए जब इलेक्शन हों.

नेता को वस्तु समझ कर चुनाव में बिकने से लेकर विज्ञापन तक बस अपनी अपनी तारीफ  उपलब्धियां गिनवाने का अधिकार हो जिसमे कानून हो आप दूसरे प्रोडक्ट की बुराई नहीं कर सकते हैं. आप के पास सबूत हैं तो कोर्ट में साबित कीजिये पब्लिक डोमेन में नहीं. अगर ऐसा हो जाये तो मेरे ख्याल से किसी भी पार्टी का भाषण ज्यादा से ज्यादा आधा घंटा रह जायेगा.

और ध्यान रहे Bagpiper Soda सोडा ही करके बिके क्योंकि शराब शरीर के लिए  हानिकारक है. 

“अणु” प्रकाश की परकाष्ठा पर

” Moaning ” कराह रही है

वो गले से गुनगुना रही है।

एक दर्द का सागर है,

रुक-२ कर ढांढस बंधा रही है।

क्या तुमने आसमान को गिरते देखा है,

नहीं अणु की “पर” तोड़ने की तैयारी है।
पर तोड़ना = नीचे उतरना।

कहीं पढ़ा था
“शास्त्र को शस्त्र न बनाएं”
विडम्बनाएं याद आने लगेंगी
जबकि वो नानी याद दिला रहा होगा।

तुमने आसमान टुटते देखा कभी,
तुमने पहाड़ टुटते सुना होगा।

स्वाहा

पहले आहुति दे दी 

फिर आहुत* किया हो जैसे।

हुंकार भरी सब शान्त किए,

महाभारत में गीता पढ़ी,

हवन हो गया।
आहुति – बलिदान, 

आहुत- आमन्त्रण, invitation 

शास्त्र को शस्त्र मत बनाइए, विध्वंस/विघटन हो जाएगा।

मरने की वजह ढूंढ ली, जिहाद में परोपकार हो गया।

इस स्वाहा का निर्धारित नैरुक्तिक अर्थ है – सही रीति से पहुंचाना परंतु क्या और किसको? यानि आवश्यक भौगिक पदार्थ को उसके प्रिय तक। हवन अनुष्ठान की ये आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण क्रिया है। कोई भी यज्ञ तब तक सफल नहीं माना जा सकता है जब तक कि हविष्य का ग्रहण देवता न कर लें। किंतु देवता ऐसा ग्रहण तभी कर सकते हैं जबकि अग्नि के द्वारा “स्वाहा” के माध्यम से अर्पण किया जाए।

उम्र को पता लग ही गया प्यार की रौशनी का,                                    कैसे नादानियों को अन्धेरा हवा दे गया होगा।

अमावस्या की रात में ये चाँद कहाँ गया होगा,

आज रात चोर है, सिपाही कहाँ गया होगा।

खेल ही खेल में खाब भी बड़े हो गये होंगें

बचपना ले के उसे भरी जवानी में कहाँ गया होगा।

“”””‘””
पहले आहुति दे दी फिर आहुत* किया हो जैसे।

हुंकार भरी सब शान्त किए, फिर गीता पढ़ी, 

हवन हो गया होगा।
आहुति – बलिदान, 

आहुत- आमन्त्रण, invitation 

वो जब भी मुंह बना के गया मुझे तेरी ज़रुरत पड़ेगी शायद, खाक में  क्या सूरतें होंगी कि अब पिन्हा* कुछ नहीं गालिब। *पिन्हा=छिपा हुआ।

“emoji” एक तो मेरी अक्लो-होश पर पर्दा उसपर तेरा यूं खुलकर मुँह न बनाना,
अब तो कुंजी भी मेरे पास है पर मेरी कुछ नज़र भी कमज़ोर है गालिब।

बाद मरने के यूं होता तो है गालिब काफिर कब्र में नहीं होता,
जो कब्र में होता है नहीं भी होता,उसकी राखे जुस्तज़ू क्या है।