शब्द अंश-२ सम्भलते रहे राग में उसके, गज़ल पग-२ फिसलने लगी नृत्य में उसके।

तुम मुझसे रोज़ वही शेर सुनती हो, 
और मैं कहता हूं लो गज़ल मुकम्मल हुई
तो तुम कहती हो
मैं बाकी हूं अभी पूरी कहां हुई।

उसको इन्तज़ार है उस मकते का
और मैं नाम नहीं लेता,
कौन पहले मर्सिया* पढ़े
अभी कयामत कहां हुई।

*मर्सिया का अर्थ है मरने वाले को याद करके रोना और उसके गुणों को याद करना. 
मैं गुनगुना लेता हूं

इक धुन में रहता हूं
उसको भी कुछ-२ अन्दाज़ा है
बिना शब्दों के
वो तर्ज़ में कहां हुई।

और जो लफ्ज़ जोड़ती है गज़ल,
उनसे सांसे उखड़ रही हैं,
आलाप के बिना 
फिर जिगर में जान कहां हुई।

जब तक जान थी पत्तों में
पतझड़ भी बहार हुई
अब रास्ते पर आ गई है,
सब जगह बिखरी है
पेड़ों पर लूटपाट कहां हूई।


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नव वर्ष की सभी को शुभ कामनाएं

मेहँदी तो छूट जाती है मेहनत रंग लाती है

कईयों को तो साल लग जाता है तब उनकी दुआ आती है।
वो जिनके दिल में है हम और वो हमारे दिल में,

जो आजके दिन भी याद नहीं करते उन कम्बख्तों की याद बहुत आती है।

Happy New year

मेरी आप बीती

    मेरी आप बीती  

(इसका एक एक अंश सच्चा है लिखने का तरीक़ा रोचक हो सकता है )

      
“सुनो जी, कहीं घूमने चलते हैं”

“अब क्या हुआ इस बार कुछ जल्दी याद कर लिया, दर्द फिर शुरू हो गया क्या।”

 भगवान अल्सर दे भी तो नापकर, छोटा या इतना कि जो अफोर्ड किया जा सके।

हमारे साथ तो कुछ ऐसा ही है। शादी के तीस साल हो गये। बस हाथ नहीं फैलाए किसी के आगे। 

ऐसा भी नहीं कुछ लोगों ने, रिश्तेदारों ने हेल्प न की हो । उन सभी का शुक्रिया।और शुक्रिया उस परवरदिगार का। कि
“बीमारी में इन्तजा़म की कोई कमी नहीं रक्खी,.                 ए खुदा तूने हमें बिमारी-शिमारी में भी जूझने के काबिल बना दिया।”

वर्ना कौन परवाह करता है किसी कि आजकल।
ये अल्सर भी न ठीक समय पर बढ़ता था। इधर कुछ छुट्टी और पैसा इकट्ठा हुआ। उधर उसका आउटिंग का मन हुआ। उसका हिल्ल स्टेशन पर मन होता था तो हमें बैड टाप फ्लोर पर ही मिलता था। सामने अरावली हिल्स सी फील आती थी हरियाली वैसी ही बिल्कुल लश-ग्रीन। पेड़ चाहें किकर के ही थे पर आखों को चुभते नहीं थे। सभी किकर हरे रंग के पर अदभुद था हजारों पेड़ पर हरेक का अपना एक अलग हरा रंग था। शुरु से हम शंकर रोड के इर्द गिर्द ही रहे फिर वो चाहें रिहाइश हो या उसपर बसा वो सर गंगाराम हस्पताल हमने छोड़ा नहीं।

अब रिटायर हो गये हैं आमदनी के नामपर पैन्शन है। हम अब जमुनापार बस गये हैं। हाय!

क्या दिन थे। 

कहावत है अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे भी नहीं रहते।

पर उस परवरदिगार का लाख-२  शुक्रिया ये समझाने के लिए कि बड़ी बिमारी से बचना है तो अपनी आमदनी कम रखियो। ये बिमारी उस बिगड़े बच्चे की तरह है कि खुल्ला मिले तो और बिगड़ जाती है।

भगवान कितनी बारिकी से सबका ख्याल रखता है उसकी सबसे बड़ी मिसाल हम दोनो है। हमारे मामले में खुदा ने कोई कंजूसी नहीं बरती कोई कोताही नहीं बरती। इधर हम कभी उसे गलती से भूले उधर उसने ही याद दिलवाया हमें।
अब हम उसे सुख में ही इतना याद कर लेते हैं कि उसको कुछ एसा करना नहीं पड़ता कि   जिससे हमें खुदा  याद आने लगे।
 
मेरी आप बीती जो जी है हमने, बिताई नहीं है। 

    बड़े सलीके से पैंठ *पसारी है हमने, पसरी नहीं है । 

××××××××
*पैंठ  -. एक खोई हुई हुंडी के स्थान पर लिखी हुई दूसरी हुंडी 

कलम दवात और टोका

स्याही के लिए क्या चाहिये,

थोड़ी कालिख और आँसु भरा पानी चाहिए।

लिखने लायक आँसू तो हो गये
डूबने लायक पानी न हुआ।
कलम को जितना जूमा चाहिए,
पर टोके* लायक चाकू न हुआ। 

टोका* कलम घड़ने के बाद उसकी टिप को चाकू से तिरछा काटने को टोका कहते हैं उससे लिखावट में निखार आता है।


मुझे नहीं परवाह तुम क्या करते हो,  मैं फूल हूं ‘दूसरा’ कोई कौशिश नहीं करता।

फूल  ने सोचा की आत्म कथा लिक्खूँ,

पंखुडियों के जैसे

कुछ पन्ने जोड़े भी उसने 

बस मुस्कानों के गट्ठर 

बांधे ही थे

कि डोर टूटी कसने में

बिखेर कर चल बसा 

व्यक्त कर गया पन्ना पन्ना

और कुछ लिख न सका। 
ये जो लोग पत्थर पर कुरेदते हैं

मेरी कहानी मत उकेरना,

मैं सह न सकूंगा ।

उस पर चन्दन घिस लेना   

फिर माथे तिलक लगा लेना

मैं सह न सकूंगा

मुझे बस अर्पित कर देना।  

स्पर्श अपने-२ सन्दर्भ में स्पन्दन की अलग-२ परिभाषा रखता है,

जिसको बहार छू जाए उसको इन्द्रधनुष भी छूने की तमन्ना रखता है।

दर्द को ये महसूस होना चाहिए,          वो जिसने दिया है कद्रदान होना चाहिए।

 वो जो सपनें में आती थी अचानक सामने आ गई,
वक्त भी देखो, चिकौटि काटने लगा है।

दर्द तो है, अब दर्द कुछ मज़ा देने लगा है,                               क्या “सुख” अपनी परिभाषा बदलने लगा है।

टूट जाओ तो तहें आसानी से सब सहेज लेती है ,
कलफ  क्रीज़ से रिश्ता, बैठाकर चलने लगा है।


उसने हीरा नहीं देखा सड़क पर पड़ा हुआ

इसमें पत्थर किसे कहूं, खुदा पूछने लगा है।


कितने सारे लोग इकट्ठे थे

उसके अन्तिम सफर में,

वो सालों से अकेला बिस्तर पर था

जब सुना कि वो चलने लगा है।


Think it over

Aआज का विचार

मुझे नहीं मालूम  पर देश बदल रहा है ।

ये वही लोग हैं जिन्होने कभी तुम्हें चुनकर सिर पर बैठाया (लगभग पचास साल से ज्यादा)। ये वही लोग जिन्होने उतारकर नीचे भी बैठा दिया। अब जिसे चुना है उसे तुम गालियां दे रहे हो भला बुरा कह रहे हो। ये वही लोग हैं जिन्होने कभी तुम्हें चुना था। पचाना सीखो अगर दुबारा उठना है तो।

अब जिन लोगों ने भाजपा को चुना है उन्हें गाली दो तुम्हारे ही भाईबन्द है। पर नहीं होगा तुमसे। क्योकि वोट तो तुम्हें इन्ही लोगों ने देना है जिन्होने तुम्हे धूल चटाई है। या अपनी खामियां या नितीयों को टटोलो शायद जवाब मिल जाए। 

विपक्ष में कुछ लोग आकड़ो से खुश ह़ै कि उनका वोट का प्रतिशत पहले से बढ़ा है।

अरे ये तो कमोबेश सारा तुम्हारा ही हुआ करता था। ये भाजपा की झोली में कैसे गया इसका सच टटोलो। या खुलकर कहो कि जनता बेवकूफ है। नहीं होगा तुमसे क्योंकि वोट तो तुम्हें इन्ही से मिलना है।

पत्थर दूर तक फैंकने है तो गुलेल पकड़ना फिर चलाना सीखो। दूरी का अन्दाज़ा न होने के कारण तुम्हारा अपना ही आंगन उजड़ रहा है।
एक भारतवासी के सौजन्य से