What a gravity गुरूत्वाकर्षण:”एक आदमी की अपनी मनोदशा से एक खुली बातचीत” । ये सारा खेल उन अदृश्य शक्तियों का है दिखाई नहीं देती।

“वो खिड़की पर रखे गमले की हर उस पत्ती को काट देता है जो खिड़की के शीशे से टकराती है।”

: “लड़की बड़ी हो गई है उसने हर उस खिड़की के पर्दे बदलना सीख लिया है जो मैले हो गये हैं।”

: “धूल का कोई ईलाज है तो बस इतना झाड़न की ज़रुरत है त्वचा उतारने की ज़रूरत नहीं है। साफ हवा के साथ ये मिट्टी इतना तो ‘सफर’ चाहती है।”

:”बाहर ठण्ड है गाड़ी में तुम्हारी सांसो की गरमाहट शीशे पर धुन्ध की चादर जमा रही है
थोड़ी सी खिड़की खोलो न कुछ धुंधलका विंडस्क्रीन पर से साफ हो जाए।”

:”अब जब ये सब बोझ लगने लगे तो डिप्रेशन और ज़रूरत से ज्यादा सफाई खाल उतार देती है।”

“एक आदमी की अपनी मनोदशा से एक खुली बातचीत”

वार्तालाप के कुछ अंश एक फिलोस्फर ने जनता मे एक सर्वे के दौरान नोट किए थे और सो काल्ड फ़्रस्ट्रेटेड आम आदमी के विचार हैं।

अगर देखा जाए तो ये सब विचार उस एक विचार से तो बेहतर है जो एक सांइटिस्ट के दिमाग में ये देखकर आया था कि आखिर सेब पेड़ से टूटने के बाद ज़मीन पर ही क्यों गिरता है।

ये अंश particles मेरे जूते मे लगे चुम्बक से चिपक गये थे एक एक करके छुड़ा रहा हूं, चलने में दिक्कत हो रही थी.

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उसकी लौ देख क्या कुछ कह रही है, अगर चौराहे पर है तो कोई टोटका कर रहा है।

चर्चा में रस बस रहा है मुद्दा फिसल रहा है,
तुझे रौशनी दिखती है और वो जो तेल जल रहा है।

जिसका बाज़ार गर्म है दरअसल वो वहां है ही नहीं,
गल्ले पर कोई और बैठा है, पकौड़े कोई और तल रहा है।

मौहब्बत भी वो हुस्ने-बला है जिसकी निस्बत* यही रही है,
चमक वो सौदा है रकीबों के दिल को सदा कसका रहा है।

*लगाव, सगा सम्बन्धी

ये खेल तो उसी का है जो दिखता नहीं है, बस खिला रहा है।

मयखाने में रुह की आईने से बात चल रही है
इक दिल चाहता है सँवार लू खुदको दूसरे शीशे में उतारना चाहता है।

वो काफिर है स्टील के गिलास में पीता है, फिर लिहाज चाहता है,
मैं पाक हूं शीशे की तरह, जाम पीने के बाद कबूलना चाहता है।

रूह पहले दिखती नहीं तो बाद में दिखाती भी क्यों है,
वो रास्ता जहाँ शरीर कुछ कर गुज़रा है अब पछतावा चाहता है।

बदी* का हिसाब कौन देगा, प्रारब्ध का रोना कौन रोए,
ये ज़िन्दगी पल-२ जुड़ रही है तू काटना चाहता है।
बदी -*कृष्णपक्ष; अँधेरा पाख,
1. बुराई; ख़राबी 2. बुरे होने की अवस्था या भाव।
प्रारब्ध- 1.आरंभ किया हुआ,
भाग्य, तकदीर,
पूर्व जन्म के कार्य।

मेरी झोली में डाल, पर कोई दुआ इस तरह न करे। झांकने और देखने में फर्क, किस्सा तो बने पर बाते न बने।।

ऐसी भी दुआ होती है कि मन्दिर मस्जिद में एक दूसरे की न बने,
आदमी है आदमी रहे, इन्सान न भी बन सके
पर हैवान न बने।

तू अगर इस दौड़ में शामिल है कि गिनती से जीत जाएगा,
इतना महज़ब का रायता न फैला कि दही जमने का कोई हिसाब न बने।

Careless or carefree. लापरवाह है बेफिक्र है सबसे पहले आशिक है, तेरी खुशी में क्या कर गुज़रे उसका कर्तब बेशक है।।

ये रिश्ते नहीं टूटे हैं पतझड़ हैं,
विरह बहार में बिना बीज की बांझड़ है।

वो केयरलैस दिखता है दर्द दिखावा नहीं करता
कुछ भी कर बैठेगा तेरी खातिर वो ऐसा औघड़* है।

*carefree