मेरा एक दोस्त जिसका नाम मौहम्मद पार्ट-2

मेरी कहानी
मेरा एक दोस्त..जिसका नाम मौहम्मद
पार्ट -2

मौहम्मद के साथ पहला दिन था। एक ही डेस्क शेयर कर रहे थे दोनो। रिसैस हुई। वैसे मैं कभी कभार लन्च लाता था। क्योंकि घर स्कूल के नज़दीक था। अक्सर घर जाकर ही लन्च करता था। पर उस दिन मैं खाना लाया था।
तो रिसैस हुई मैंने अपना टिफिन खोला। मौहम्मद ने भी अपना टिफिन खोला। उसने जैसे ही कटोरी बाहर निकाली मेरे चेहरे का रंग उड़ गया। मैने उस दिन ज़िन्दगी में पहली दफा सब्जी की कटोरी में हड्डी देखी थी। मैं ब्राह्मण परिवार से था और दूर दूर तक मीट की कोई सोच नहीं सकता था।
मौहम्मद शायद समझ गया और उसने टिफिन यह कहकर बन्द कर दिया कि उसकी मटन की करी खराब हो गयी है। और वो अनमना सा होकर बैठ गया।
मैने अपना टिफिन उसकी तरफ बढ़ाया और बोला साग है खायेगा।मै बोलाः हम शाकाहारी हैं पर हम इतनी भी घृणा नहीं करते हैं। मौहम्मद मुस्कुराया और मेरे साथ खाना खाने लगा।
खाना खाने के बाद हम नलके पर हाथ धो रहे थे
तो मौहम्मद बोला तूने अभी कहा कि हम शाकाहारी हैं इतनी भी घृणा नहीं करते। मुस्कुराते हुए मौहम्मद बोला “हम मांसाहारी है हम कभी घृणा नहीं करते हैं”।
अभी भी जब इस बात को सोचता हूं तो मुझे इसका सिरा मिलता है पर छोर नहीं मिलता।
फिर मेरे मन में एक प्रश्न उठता है?
घृणा कौन करता है?
सामर्थ्य हीन या सामर्थ्यवान।
फिर मुझे पता लगा उस दिन के बाद मौहम्मद कभी स्कूल में मांस अहार नहीं लाया। वो शाकाहारी खाना ही लाता था।
मुझसे रहा नहीं गया मैं पूछ ही बैठा कि वो ऐसा क्यों कर रहा है।
हंसते हुए बहुत बड़ी बात कह गया कि मेरा पास गुंजाइश थी तेरे पास नहीं है। तू साथ छोड़ देता।

फिर एक अट्टहास भरा और कहने लगा कि तुझे मालूम है कि हम उन्हीं का मीट खाते हैं जो ज्यादातर शाकाहार खाते हैं।

फिर थोड़ा गम्भीर हुआ और बोला कि
“मैने मीट लाना छोड़ा तेरी खातिर। अब बड़ों को सोचना है उनके पास तो इफरात गुंजाईशे हैं देश की खातिर वो गाय का मीट तो छोड़ ही सकते ह़ैं।”

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ये मूड भी क्या चीज़ है, अपने इलावा बड़ा बद-तमीज़ है।

ये मूड भी क्या चीज़ है
कभी उदास होता है तो रुह से काम लेता है।
और खुश होता है तो
बदन खिला लेता है।
रोता है तो रोयाँ रोयाँ,
हंसता है तो बस खिल-खिला लेता है।

ये मूड भी क्या चीज़ है
सब कुछ तो है जो ज़रूरी है,
फिर भी कुछ और ढूंढने निकलता है
ज़िन्दगी को अभावों से घेर लेता है।

आज मूड नहीं है
भला ये भी कोई बात है
आज फील नहीं आई
भला ये भी कोई बात है
ये मूड ही है जो बैठे बिठाए
कह देता है अबके ईद फीकी रही
और बकरे की जान ले लेता है।

इतने सलीके से उसने पतियाया* कि दिल टूटा आवाज़ न हुई, और दिल बहल भी गया।

जैसे किसी बच्चे ने खिलौना आंख भर देखा,

ज़िद छोड़ी और मान भी गया।।

*तरीके से मना लेना

चोट लगती है तब जाके दर्द उभरता है,                         कितनी मुश्किल से उसका  किरदार खिलता है।

चोट लगती है तब जाके दर्द उभरता है,                             कितनी मुश्किल से उसका  किरदार खिलता है।

कितने दिनों से शिरकत* मे हूं कि ख्वाब आए,                  यूं ही नहीं मुद्दतों में दीदावर+ पैदा होता है।

तुझसे बिछड़ कर क्या क्या न मिला हमें                         तेरे सिवा फुरक़त# में सारा ज़माना मिलता है। 

अगर मिल गये होते तो कौन जाने शीरीं फरहाद कहां होता, दुनिया की ज़ुबाँ पर जो भी जोड़ा है  बिछड़े तो मशहूर होता है।

#वियोग/जुदाई में

पारखी +

*शरीक होने की अवस्था या भाव/साझा


घोल कर पीना है तो पहले पिघलाना उसे, फिर देखना ज़िन्दगी को धागे सा मोम से कैसे निकालता हूं।

मेरी और मेरे हुनर की नकल तो आफताब भी करे है,

रात डूबता मयखाने में हूँ पर सुबह घर से निकलता  हूँ ।

आफताब से सामना मुमकिन है इसी मौसम में,  या वो करे जो रहे ज़िन्दगी भर सहरा में।

कितना है बदनसीब ज़फर कि धूप सेकने के वक्त,

अपने ही चेहरे से हाथ जला बैठा इस धुआँ-२ दयार में ।

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उसकी निगाहे-तरकश की क्या कहें,

हम मरे जा रहें है और वो तीर चलाता नहीं।

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मैने भी अनचाहे लम्हों को नकारा नहीं,.                        उन तिरस्कृत खतों की लुगदी का गत्ता बनाकर गर जिन्दगी की किताब को बचाता नहीं।